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AIIMS Delhi: महंगे EPD डिवाइस के बिना भी सफल हुई कैरोटिड स्टेंटिंग, एम्स के अध्ययन ने बदली स्ट्रोक इलाज की दिशा

AIIMS Delhi: महंगे EPD डिवाइस के बिना भी सफल हुई कैरोटिड स्टेंटिंग, एम्स के अध्ययन ने बदली स्ट्रोक इलाज की दिशा

नई दिल्ली, 25 मई: स्ट्रोक के इलाज को लेकर एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने एक ऐसा अध्ययन सामने रखा है, जिसने चिकित्सा जगत में नई चर्चा शुरू कर दी है। एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि कैरोटिड आर्टरी स्टेंटिंग (सीएएस) के दौरान इस्तेमाल होने वाला महंगा “एम्बोलिक प्रोटेक्शन डिवाइस” (EPD) हर मरीज के लिए जरूरी नहीं है। अनुभवी डॉक्टरों द्वारा सही समय पर की गई प्रक्रिया बिना EPD के भी सुरक्षित और प्रभावी साबित हो सकती है।

एम्स दिल्ली के न्यूरोइमेजिंग और इंटरवेंशनल न्यूरोरेडियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इस रिसर्च में 146 मरीजों पर की गई 156 कैरोटिड स्टेंटिंग प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया गया। यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल ‘एनल्स ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में सामने आया कि स्ट्रोक के लक्षण दिखाई देने के लगभग 37 दिन बाद स्टेंटिंग कराने वाले मरीजों में जटिलताओं का खतरा काफी कम रहा। रिसर्च के अनुसार केवल 4.11 प्रतिशत मरीजों में प्रक्रिया के दौरान स्ट्रोक जैसी समस्या देखी गई, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के ट्रायल्स के बराबर माना जा रहा है।

डॉ. गायकवाड़ ने बताया कि कैरोटिड आर्टरी स्टेनोसिस ऐसी स्थिति होती है, जिसमें गर्दन की मुख्य रक्त वाहिका में चर्बी, कोलेस्ट्रॉल और कैल्शियम जमा होने से नस संकरी हो जाती है। इससे दिमाग तक रक्त का प्रवाह प्रभावित होता है और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। इसके प्रमुख लक्षणों में अचानक हाथ-पैर में कमजोरी, बोलने में परेशानी, एक आंख की रोशनी कम होना, चक्कर आना और टीआईए यानी मिनी स्ट्रोक शामिल हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक EPD का उपयोग छोटे खून के थक्कों को दिमाग तक पहुंचने से रोकने के लिए किया जाता है, लेकिन कई मामलों में यही उपकरण प्रक्रिया को अधिक जटिल और महंगा बना देता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि 96 प्रतिशत से अधिक मामलों में ओपन-सेल स्टेंट सफल रहे और दोबारा नस संकरी होने यानी री-स्टेनोसिस की संभावना बेहद कम रही।

डॉक्टरों ने हाई बीपी, डायबिटीज, धूम्रपान और हाई कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित लोगों को नियमित जांच कराने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच और सही उपचार के जरिए स्ट्रोक के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सीमित संसाधनों वाले देशों के लिए यह अध्ययन कम खर्च में बेहतर इलाज का नया विकल्प साबित हो सकता है।

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