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नई दिल्ली: प्रसवपूर्व जांच केंद्रों की निगरानी में कमी बनी लिंगानुपात में गिरावट की प्रमुख वजह !

नई दिल्ली: -जिला निगरानी समिति के गठन से महिला लिंगानुपात में हो सकता है इजाफा

नई दिल्ली, 16 सितम्बर : राष्ट्रीय राजधानी में पुरुष -महिला लिंगानुपात में लगातार चार साल से आ रही गिरावट ने जहां देशभर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। वहीं, समाज शास्त्रियों ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के साथ स्वस्थ नारी सशक्त परिवार अभियान की शुरुआत से समाज में नया बदलाव आने की उम्मीद जताई है।

दरअसल, दिल्ली के आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय और मुख्य रजिस्ट्रार (जन्म एवं मृत्यु) कार्यालय ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में दावा किया है कि 2024 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 920 महिलाओं का जन्म हुआ है, जबकि 2023 में यह आंकड़ा 922 और 2022 में 929 था। हालांकि दिल्ली सरकार के अधिकारी लिंगानुपात में गिरावट को मामूली बता रहे हैं लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समाज शास्त्री चिंता जता रहे हैं। उनका मानना है कि यह गिरावट दिल्ली-एनसीआर में अवैध प्रसवपूर्व लिंग निर्धारण परीक्षणों की ओर इशारा करती है जिस पर लगाम लगाने के लिए सख्ती बरतनी जरुरी है।

लैब और अल्ट्रासाउंड केंद्रों के निरीक्षण में कमी
रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों के मुतबिक दिल्ली शहर के लिंगानुपात में 2020 में कुछ सुधार हुआ था, जब यह पिछले वर्ष के 920 से बढ़कर 933 हो गया था। तब से, इसमें गिरावट आई है – 2021 में 932 और 2022 में 929। दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा कि लैब और अल्ट्रासाउंड केंद्रों के निरीक्षणों की संख्या में कमी या उदासीनता बरतने के चलते भी लिंगानुपात पर असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि कम निरीक्षणों की वजह से कारण बताओ नोटिस और पंजीकरण निलंबन कम हुए हैं, जिससे पूरी निवारक प्रणाली कमजोर हुई है।

शिशु जन्म पर मातृ शिक्षा का प्रभाव
जब मातृ शिक्षा के स्तर के विरुद्ध जन्म क्रम का विश्लेषण किया गया, तो एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया। चौथे या उससे ऊपर के क्रम में जन्म लेने वाली माताओं में, 41.1 प्रतिशत की शिक्षा मैट्रिक और स्नातक से नीचे के बीच थी, जबकि 16.7 प्रतिशत निरक्षर थीं। ऐसे जन्मों में से केवल 9.6 प्रतिशत स्नातक या उससे ऊपर की योग्यता वाली माताओं में दर्ज किए गए, जो कम शिक्षा और उच्च प्रजनन दर के बीच एक स्पष्ट संबंध को दर्शाता है। अगर जन्म क्रम के संदर्भ में देखा जाए तो , 51.5 प्रतिशत बच्चे पहली बार जन्म ले रहे थे, उसके बाद 36.4 प्रतिशत दूसरे क्रम के, 10.2 प्रतिशत तीसरे क्रम के और लगभग 2 प्रतिशत चौथे या उससे ऊपर के थे।

महिला लिंगानुपात में कमी के पीछे 5 बड़े कारण
स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक जिला स्तर पर स्वास्थ्य केंद्रों में एनआईपीटी किट (गर्भ लड़का/लड़की की पहचान) की उपलब्धता को सीमित ना करना, मेडिकल स्टोर पर एमटीपी किट (एबॉर्शन की दवा) का आसानी से मिलना। महिला शिशु लिंग परीक्षण के बाबत जागरूकता अभियानों में कमी आना और पारंपरिक भारतीय परिवारों में बेटी की अपेक्षा बेटों को तरजीह देना और आईवीएफ पद्धति से संतान पाने के दौरान प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक्स टेस्टिंग (पीजीटी) के जरिये एम्ब्रीओ (भ्रूण) के लिंग की पहचान करना। ये पांच ऐसे प्रमुख कारण हैं जिनमें बदलाव लेकर महिला लिंगानुपात को बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा महंगाई भी एक प्रमुख कारण है जिसके चलते लोग परिवार छोटे रखने के लिए प्रेरित हो रहे हैं ।

महिला लिंगानुपात बढ़ाने के लिए क्या करें ?
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक दिल्ली में पिछले दो साल से बेटी बचाओ जागरूकता अभियान बिल्कुल बंद है। इसे चालू किया जाए ताकि लोगों के माइंडसेट में बदलाव लाया जा सके। जिला स्तर पर एनआईपीटी किट की उपलब्धता और एमटीपी किट की बिक्री को रोका जाए। संदिग्ध लैब को चयनित करके रेगुलेट किया जाए। पीसी-पीएनडीटी एक्ट को लागू करने में सख्ती बरती जाए। नियमों का उल्लंघन करने वालों को केवल नोटिस जारी करने की बजाय सख्त कार्रवाई की जाए। इसके अलावा सभी 11 जिलों में डीएम के नेतृत्व में एक -एक कमेटी गठित की जाए जिसमें महिला एवं बाल विकास अधिकारी, दिल्ली विधिक सेवाएं प्राधिकरण अधिकारी और चिकित्सा अधिकारी शामिल हों। ये लोग निगरानी और नियंत्रण प्रक्रिया को सख्ती से अमल में ला सकेंगे।

औसत दैनिक जन्म में गिरावट
दिल्ली में 2024 में 3,06,459 जन्म दर्ज किए गए, जो 2023 में 3,15,087 जन्मों से कम है। औसत दैनिक जन्म संख्या पिछले वर्ष के 863 से घटकर 837 हो गई। कुल जन्मों में से 52.1 प्रतिशत पुरुष, 47.9 प्रतिशत महिलाएं और 0.03 प्रतिशत अन्य श्रेणी में थे, जिनमें ट्रांसजेंडर, अस्पष्ट या अघोषित मामले शामिल हैं। इनमें से अधिकांश जन्म, 96.1 प्रतिशत, संस्थागत प्रसवों में हुए, जिनमें से 65.11 प्रतिशत संस्थागत प्रसव सरकारी अस्पतालों में हुए। घरेलू (घर पर) प्रसव 3.9 प्रतिशत थे, और इनमें से लगभग 17 प्रतिशत को प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की सहायता मिली, जबकि 61.4 प्रतिशत प्रसव रिश्तेदारों या अप्रशिक्षित सहायता पर निर्भर रहे।

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