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AIIMS Delhi workshop: दुर्लभ रोगों पर सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को जागरूक किया गया, समय पर पहचान से मिल सकती है नई जिंदगी

AIIMS Delhi workshop: दुर्लभ रोगों पर सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को जागरूक किया गया, समय पर पहचान से मिल सकती है नई जिंदगी

नई दिल्ली, 22 फरवरी। समय पर पहचान, बेहतर उपचार और वित्तीय सहयोग के जरिए दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। इसी उद्देश्य से एम्स दिल्ली के बाल रोग विभाग की जेनेटिक्स डिवीजन और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर रेयर डिजीज ने ‘दुर्लभ रोग जागरूकता: निदान से देखभाल तक’ विषय पर सीडीईआर में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया।

इस कार्यशाला में एम्स और अन्य अस्पतालों के करीब 80 सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया, ताकि दुर्लभ बीमारियों की शुरुआती पहचान और प्रबंधन को बेहतर बनाया जा सके। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, मरीजों और उनके तीमारदारों ने भी भाग लिया, जिससे चिकित्सा और मानवीय दोनों दृष्टिकोणों पर व्यापक चर्चा संभव हो सकी।

विशेषज्ञों ने बताया कि दुर्लभ बीमारियां ऐसी स्वास्थ्य स्थितियां हैं जो बहुत कम लोगों को प्रभावित करती हैं और इनमें से लगभग 80 प्रतिशत आनुवंशिक होती हैं, जो प्रायः बचपन में ही सामने आ जाती हैं। भारत में करीब 450 से अधिक दुर्लभ बीमारियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें गौशर रोग (लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर), सिस्टिक फाइब्रोसिस, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी और टायरोसिनेमिया प्रमुख हैं। अनुमान के मुताबिक देश में 5.6 करोड़ से 7.2 करोड़ लोग इन बीमारियों से प्रभावित हो सकते हैं।

कार्यशाला के दौरान लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर, मेटाबॉलिक लिवर डिजीज, सिस्टिक फाइब्रोसिस, एंडोक्राइन और किडनी से जुड़ी दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों ने अपने अनुभव साझा किए। उनकी कहानियों ने उपस्थित डॉक्टरों और विशेषज्ञों में मानवीय संवेदना को और गहरा किया तथा इस दिशा में समर्पित प्रयासों की आवश्यकता को रेखांकित किया।

15 उत्कृष्टता केंद्रों की नोडल अधिकारी डॉ. नीरजा गुप्ता ने कहा कि अक्सर समय पर सही पहचान न होने से मरीज और उनके परिवार को भारी आर्थिक बोझ, दवाओं की कमी और जागरूकता के अभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ‘राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति 2021’ (NPRD 2021) के तहत पात्र मरीजों को 50 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिससे उपचार का खर्च वहन करने में मदद मिलती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की जागरूकता और प्रशिक्षण से दुर्लभ रोगों की पहचान में तेजी आएगी, जिससे मरीजों को समय रहते उपचार और बेहतर देखभाल मिल सकेगी।

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संवाददाता

Tirthankar Sarkar

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