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बुनियादी ढांचे से आगे: कैसे बदल रहा है भारत के विकास का मॉडल

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बुनियादी ढांचे से आगे: कैसे बदल रहा है भारत के विकास का मॉडल

रिपोर्ट: अभिषेक ब्याहुत

नई दिल्ली: भारत के आर्थिक विकास की कहानी को अगर केवल GDP, निवेश या सरकारी योजनाओं के आंकड़ों से समझने की कोशिश की जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की असली ताकत इस बात में होती है कि उसके पास लोगों, सामान, ऊर्जा, पूंजी और अवसरों को कितनी तेजी और कुशलता से आगे बढ़ाने की क्षमता है। पिछले करीब बारह वर्षों में भारत में इसी क्षमता को बड़े पैमाने पर मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है। सड़क और रेलवे से लेकर बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा, पानी, स्वास्थ्य, स्टार्टअप और रक्षा उत्पादन तक—कई क्षेत्रों में विस्तार एक साथ हुआ है। इसके साथ ही GST, श्रम सुधार, पुराने कानूनों को हटाने, बैंकिंग क्षेत्र के पुनर्पूंजीकरण और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी NPAs में कमी जैसे संस्थागत बदलावों ने भी अर्थव्यवस्था के संचालन के ढांचे को प्रभावित किया है। इस बदलाव को केवल नई परियोजनाओं की सूची के रूप में देखना शायद इसकी सबसे बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा। असली सवाल यह है कि क्या भारत अब उस बुनियादी क्षमता का निर्माण कर रहा है, जिसकी जरूरत एक बड़ी, अधिक औद्योगिक और अधिक वैश्विक अर्थव्यवस्था को होगी।

सड़क और रेल नेटवर्क में बड़ा बदलाव

आंकड़ों के मुताबिक, 2014 से पहले देश में कोई Dedicated Freight Corridor चालू नहीं था। अब 2,843 किलोमीटर का नेटवर्क बताया गया है। एक्सप्रेसवे की लंबाई भी 1,000 किलोमीटर से बढ़कर करीब 7,700 किलोमीटर हो गई है। चार लेन और उससे ज्यादा वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई में भी 45,516 किलोमीटर की बढ़ोतरी बताई गई है।

एयरपोर्ट और मेट्रो का भी विस्तार

आंकड़ों में 2014 में मौजूद 74 एयरपोर्ट के मुकाबले बाद के सालों में 164 नए एयरपोर्ट जुड़ने की बात कही गई है। साथ ही मेट्रो नेटवर्क भी 250 किलोमीटर से बढ़कर करीब 1,250 किलोमीटर बताया गया है। मौजूदा मेट्रो नेटवर्क का 75 प्रतिशत हिस्सा 2014 के बाद तैयार होने का दावा किया गया है।

हाईवे और रेलवे में भी बदली तस्वीर

चार लेन और उससे ज्यादा क्षमता वाले नेशनल हाईवे को लेकर सामने आए आंकड़ों में भी बड़ा अंतर दिखाया गया है. 2014 में ऐसे राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई करीब 18,371 किलोमीटर बताई गई थी. इसके बाद इसमें करीब 45,516 किलोमीटर की वृद्धि का दावा किया गया है. आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा हाई-कैपेसिटी हाईवे नेटवर्क का करीब 60 फीसदी हिस्सा 2014 के बाद जोड़ा गया. रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन में भी तेजी का दावा है. आंकड़ों के अनुसार, 2014 में करीब 21,800 किलोमीटर रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण हुआ था. इसके बाद इलेक्ट्रिफाइड नेटवर्क में करीब 69,800 किलोमीटर की वृद्धि बताई गई है. दावा है कि भारतीय रेलवे के इतिहास में हुए कुल विद्युतीकरण का करीब 69 फीसदी हिस्सा पिछले 12 सालों में पूरा हुआ.

उद्योग और आत्मनिर्भरता का नया चरण

इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार औद्योगिक क्षमता के साथ मिलकर अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। स्टील, कोयला और गैस पाइपलाइन नेटवर्क में वृद्धि इस दिशा में महत्वपूर्ण है। स्टील की जरूरत सड़क, पुल, रेलवे, कारखानों और मशीनरी से लेकर रक्षा उत्पादन तक लगभग हर बड़े औद्योगिक क्षेत्र में होती है। इसी तरह ऊर्जा और गैस की उपलब्धता उद्योगों के विस्तार की बुनियादी जरूरत है। रक्षा क्षेत्र में बदलाव इस कहानी का एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के रक्षा निर्यात में पिछले वर्षों में तेज वृद्धि हुई है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, रक्षा निर्यात 2013-14 के करीब ₹686 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹38,424 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। यह केवल निर्यात का आंकड़ा नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि भारत घरेलू रक्षा उत्पादन की क्षमता बढ़ाने और वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो इसके परिणाम रक्षा क्षेत्र से बाहर भी दिखाई दे सकते हैं—निजी उद्योग, MSMEs, स्टार्टअप, अनुसंधान और उच्च-कौशल रोजगार के रूप में।

नौकरी खोजने वाली पीढ़ी से नौकरी पैदा करने वाली पीढ़ी तक?

भारत के आर्थिक बदलाव की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक स्टार्टअप इकोसिस्टम की है। 2014 में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या लगभग 500 थी। आज यह संख्या 2 लाख से अधिक हो चुकी है। यह वृद्धि केवल एक सरकारी योजना की सफलता का आंकड़ा नहीं है। यह भारत की बदलती उद्यमशील मानसिकता का संकेत भी है। आज का युवा केवल सरकारी नौकरी या पारंपरिक कॉरपोरेट रोजगार को ही सफलता का रास्ता नहीं मानता। टेक्नोलॉजी, फिनटेक, हेल्थटेक, ई-कॉमर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में नई कंपनियां उभर रही हैं। हालांकि, स्टार्टअप की संख्या बढ़ना और सफल व्यवसायों की संख्या बढ़ना एक ही बात नहीं है। असली चुनौती इन कंपनियों को टिकाऊ, रोजगार पैदा करने वाले और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी व्यवसायों में बदलने की होगी।

 

 

 

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संवाददाता

Tirthankar Sarkar

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