
Orthopedic Surgery Training: ORTHOPEDIC सर्जरी में नई पहल, शवों पर प्रशिक्षण से आर्थ्रोस्कोपिक तकनीक में निपुण हुए सर्जन
नई दिल्ली, 8 फरवरी। देश में ऑर्थोपेडिक समस्याओं, खासकर बार-बार कंधा उतरने की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए राम मनोहर लोहिया अस्पताल ने चिकित्सा प्रशिक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल की है। आरएमएल अस्पताल के अस्थि रोग विभाग ने शरीर रचना विभाग के सहयोग से शनिवार को शोल्डर आर्थ्रोस्कोपी कैडेवरिक वर्कशॉप का आयोजन किया, जिसमें दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों से आए 50 से अधिक ऑर्थोपेडिक सर्जनों को शवों पर आर्थ्रोस्कोपिक सर्जरी की व्यावहारिक ट्रेनिंग दी गई।
अस्थि रोग विभाग के प्रमुख डॉ. राहुल खरे ने बताया कि वर्तमान समय में उच्च प्रशिक्षित आर्थ्रोस्कोपिक सर्जनों की देश में भारी कमी है, जबकि कंधे से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। जिम और हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट, प्रतिस्पर्धी खेलों में भागीदारी, गलत पोस्चर, कमजोर शोल्डर मसल्स और शुरुआती चोटों को नजरअंदाज करना इसके प्रमुख कारण हैं। कई बार लोग कंधे की चोट को यह सोचकर टाल देते हैं कि वह अपने आप ठीक हो जाएगी, लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर समस्या बन जाती है।
डॉ. खरे के अनुसार रोटेटर कफ टियर, बार-बार कंधे का खिसकना, स्लेप टियर और कंधे में सूजन जैसी समस्याएं अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा देखने को मिल रही हैं। इन जटिल समस्याओं का प्रभावी इलाज आर्थ्रोस्कोपिक सर्जरी से संभव है, जिसमें छोटे चीरों के जरिए अंदरूनी हिस्से की मरम्मत की जाती है। इस तकनीक से न केवल सर्जरी अधिक सटीक होती है, बल्कि मरीज की रिकवरी भी तेज होती है और दर्द व रक्तस्राव भी कम होता है।
वर्कशॉप के दौरान सर्जनों को कंधे की आर्थ्रोस्कोपिक सर्जरी की बारीकियों को शवों पर अभ्यास के माध्यम से समझाया गया। इस प्रक्रिया में छोटे चीरे लगाकर एक विशेष कैमरा कंधे के जोड़ में डाला जाता है, जिससे अंदरूनी संरचना स्क्रीन पर स्पष्ट दिखाई देती है। इसके बाद विशेष उपकरणों की मदद से टेंडन, लेब्रम और अन्य क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत की जाती है। इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि मरीज को अस्पताल में कम समय रुकना पड़ता है और वह जल्दी सामान्य जीवन में लौट सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कंधा बार-बार खिसकना कोई सामान्य उम्र संबंधी समस्या नहीं है और न ही इसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए। आमतौर पर यह समस्या पहली चोट के बाद शुरू होती है, जब कंधे का जोड़ अपनी जगह पर स्थिर नहीं रह पाता। यदि कंधा दो या उससे अधिक बार खिसक चुका हो, हाथ उठाने पर अस्थिरता या डर महसूस हो और नींद या रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हों, तो तुरंत ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है। एमआरआई जांच से इसकी सही वजह का पता लगाया जा सकता है।
इस वर्कशॉप में डॉ. अशोक कुमार, डॉ. विनोद कुमार, डॉ. विवेक दीवान, डॉ. साहू और डॉ. ज्योति अरोड़ा सहित कई वरिष्ठ विशेषज्ञ मौजूद रहे। अस्पताल प्रशासन का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम भविष्य में बेहतर इलाज और मरीजों को उन्नत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएंगे।
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