Infertility Treatment: बांझपन उपचार में तकनीक के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी, विशेषज्ञों ने एआरटी पर किया मंथन

Infertility Treatment: बांझपन उपचार में तकनीक के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी, विशेषज्ञों ने एआरटी पर किया मंथन

नई दिल्ली, 14 अगस्त। बांझपन का उपचार केवल आधुनिक तकनीक और चिकित्सा प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मरीजों की भावनाओं, आर्थिक परिस्थितियों और अधिकारों का सम्मान भी बेहद महत्वपूर्ण है। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज (एलएचएमसी) और सुचेता कृपलानी अस्पताल के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की ओर से आयोजित सीएमई ‘द एआरटी ऑफ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन’ में विशेषज्ञों ने सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) के वैज्ञानिक, नैतिक और संवेदनशील इस्तेमाल पर जोर दिया।

सीएमई का उद्घाटन एलएचएमसी की निदेशक डॉ. हिमानी अहलूवालिया ने किया। उन्होंने संस्थान में अत्याधुनिक आईवीएफ केंद्र विकसित करने और एआरटी सेवाओं को मजबूत करने के लिए पूर्ण सहयोग का भरोसा दिलाया। कार्यक्रम का आयोजन एआरटी सेवाओं की प्रभारी प्रो. पिकी सक्सेना और उनकी टीम की ओर से किया गया, जबकि प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. रत्ना बिस्वास ने कार्यक्रम का संयोजन किया।

विशेषज्ञों ने कहा कि बांझपन का इलाज कराने वाले मरीज अक्सर लंबे उपचार, आर्थिक खर्च और भावनात्मक दबाव से गुजरते हैं। इसलिए चिकित्सकीय उपचार के साथ उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति को समझना भी जरूरी है। उपचार के दौरान मरीजों को उपलब्ध विकल्पों, संभावित परिणामों और जोखिमों के बारे में स्पष्ट तथा प्रमाण आधारित जानकारी दी जानी चाहिए।

सीएमई में सहायक प्रजनन तकनीक और सरोगेसी से जुड़े बदलते कानूनी प्रावधानों पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि एआरटी सेवाओं से जुड़े चिकित्सकों और संस्थानों के लिए कानूनी एवं नैतिक नियमों की जानकारी रखना आवश्यक है, ताकि उपचार मरीजों के अधिकारों और निर्धारित नियमों के अनुरूप किया जा सके।

कार्यक्रम में व्यक्तिगत ओवेरियन स्टिमुलेशन, कम ओवेरियन रिजर्व और बार-बार इंप्लांटेशन विफलता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। पुरुष बांझपन, एंडोमेट्रियोसिस और फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन भी चर्चा के प्रमुख विषय रहे।

विशेषज्ञों ने अनप्रूव्ड ‘एआरटी ऐड-ऑन’ से सावधान रहने की सलाह दी। उनका कहना था कि मरीजों को ऐसे उपचार या तकनीक के बारे में जानकारी देते समय यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उसका वैज्ञानिक प्रमाण कितना मजबूत है। उपचार के नाम पर ऐसे विकल्पों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए जिनकी प्रभावशीलता पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाणों से स्थापित नहीं हुई है।

सीएमई में इस बात पर भी जोर दिया गया कि बांझपन उपचार में मरीज की व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार उपचार योजना तैयार की जानी चाहिए। हर मरीज की चिकित्सकीय स्थिति अलग होती है, इसलिए उपचार के विकल्प भी उसकी स्थिति, उम्र, स्वास्थ्य और प्रजनन संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तय किए जाने चाहिए।

विशेषज्ञों ने कहा कि एआरटी के क्षेत्र में लगातार तकनीकी विकास हो रहा है और आईवीएफ जैसी प्रक्रियाओं ने कई दंपतियों के लिए गर्भधारण की संभावनाएं बढ़ाई हैं। हालांकि, तकनीकी प्रगति के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उपचार वैज्ञानिक प्रमाण, नैतिक मानकों और मरीजों की गरिमा के अनुरूप हो।

कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा विशेषज्ञों ने ज्ञान और अनुभव साझा करते हुए एआरटी सेवाओं को अधिक प्रभावी और मरीज-केंद्रित बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। एलएचएमसी में अत्याधुनिक आईवीएफ केंद्र और मजबूत एआरटी सेवाओं के विकास को भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

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