Kidney Screening: किडनी फेल होने से पहले बीमारी पकड़ने की तैयारी, 20 साल से अधिक उम्र के BPL लोगों की साल में दो बार मुफ्त जांच की सिफारिश
नई दिल्ली, 13 अगस्त। देश में क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) का बढ़ता बोझ स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, खराब जीवनशैली, मधुमेह, हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे के कारण किडनी की बीमारी का खतरा लगातार बढ़ रहा है। पहले जहां यह समस्या अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा देखी जाती थी, वहीं अब युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
इसी चुनौती को देखते हुए संसदीय समिति ने 20 वर्ष से अधिक उम्र के गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवनयापन करने वाले परिवारों के सदस्यों की साल में दो बार मुफ्त किडनी जांच कराने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य किडनी की बीमारी को शुरुआती चरण में पहचानना और उसे किडनी फेल्योर तक पहुंचने से रोकना है, ताकि डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत को यथासंभव टाला जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में किडनी फेल्योर और डायलिसिस की जरूरत पश्चिमी देशों की तुलना में करीब 10 से 15 साल पहले शुरू हो सकती है। चिंता की बात यह भी है कि किडनी के फिल्टर पर असर कम उम्र से ही शुरू होने की संभावना रहती है। ऐसे में जोखिम वाले लोगों की नियमित जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
डायबिटीज और हाई बीपी से बढ़ रहा खतरा
सफदरजंग अस्पताल के नेफ्रोलॉजी और रीनल ट्रांसप्लांट मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं एचओडी डॉ. हिमांशु वर्मा के मुताबिक, टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित करीब 40 प्रतिशत मरीजों में किडनी प्रभावित हो सकती है। हर साल बड़ी संख्या में मरीज एंड-स्टेज रीनल डिजीज (ESRD) की स्थिति में पहुंचते हैं।
भारत में हर साल दो लाख से अधिक नए एंड-स्टेज किडनी डिजीज मरीज सामने आने का अनुमान है। हालांकि, इन मरीजों तक डायलिसिस और ट्रांसप्लांट जैसी सुविधाओं की पहुंच अभी भी सीमित है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब 6 से 10 प्रतिशत मरीजों को ही डायलिसिस की सुविधा मिल पाती है, जबकि लगभग एक प्रतिशत मरीजों तक किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा पहुंच पाती है।

देश में अभी सार्वभौमिक किडनी स्क्रीनिंग व्यवस्था नहीं
एम्स दिल्ली के नेफ्रोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप महाजन के अनुसार, फिलहाल देश में सभी लोगों के लिए मुफ्त किडनी स्क्रीनिंग की कोई एकीकृत राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं है। राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की जांच की जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसी व्यवस्था में सीरम क्रिएटिनिन और यूरिन एल्ब्यूमिन जैसी जांचों को प्रभावी तरीके से शामिल किया जाए तो किडनी की बीमारी का शुरुआती चरण में पता लगाने में मदद मिल सकती है। पॉइंट-ऑफ-केयर टेस्टिंग के माध्यम से बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग को भी संभव बनाया जा सकता है।
सस्ती जांचों से शुरुआती पहचान संभव
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम प्रकाश ने बताया कि किडनी स्क्रीनिंग के लिए जरूरी जांचें अपेक्षाकृत किफायती हैं। उनके विभाग की ओपीडी में आने वाले वयस्क मरीजों में बीपी, यूरिन और ब्लड शुगर की नियमित जांच की जा रही है।
यूरिन में एल्ब्यूमिन की जांच से किडनी पर शुरुआती असर का पता लगाया जा सकता है। वहीं, नियमित ब्लड शुगर जांच से डायबिटीज को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी व्यवस्था किडनी फेल्योर आने से पहले बीमारी की पहचान और रोकथाम में अहम भूमिका निभा सकती है।
BPL परिवारों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत
कम आय वाले परिवारों में नियमित स्वास्थ्य जांच की पहुंच अपेक्षाकृत कम होती है। ऐसे में 20 वर्ष से अधिक उम्र के BPL परिवारों के सदस्यों की साल में दो बार किडनी जांच कराने की सिफारिश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
खासकर ऐसे लोगों पर निगरानी जरूरी होगी जिन्हें डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर है। इन दोनों स्थितियों का लंबे समय तक अनियंत्रित रहना किडनी की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे प्रभावित कर सकता है।
लक्षण आने का इंतजार पड़ सकता है भारी
किडनी की बीमारी को अक्सर ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है, क्योंकि शुरुआती चरण में इसके स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। थकान, शरीर में सूजन या पेशाब में बदलाव जैसे संकेत सामने आने तक कई बार किडनी की कार्यक्षमता काफी कम हो चुकी होती है।
इसी वजह से विशेषज्ञ केवल लक्षणों के आधार पर जांच कराने के बजाय जोखिम वाले लोगों की नियमित स्क्रीनिंग पर जोर दे रहे हैं। समय रहते CKD की पहचान होने पर ब्लड प्रेशर और डायबिटीज को नियंत्रित करने तथा उपयुक्त उपचार के जरिए बीमारी की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिर बन सकते हैं पहला केंद्र
देशभर में मौजूद आयुष्मान आरोग्य मंदिर और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के नेटवर्क का इस्तेमाल बड़े स्तर पर किडनी स्क्रीनिंग के लिए किया जा सकता है। इसके लिए प्राथमिक स्तर पर क्रिएटिनिन और यूरिन एल्ब्यूमिन/ACR जांच की सुविधा उपलब्ध कराने के साथ स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत होगी।
जिन लोगों की रिपोर्ट संदिग्ध आए, उनके लिए जिला अस्पताल और विशेषज्ञ केंद्र तक समय पर रेफरल की व्यवस्था भी जरूरी होगी।
स्क्रीनिंग के बाद फॉलो-अप सबसे जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक केवल जांच शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जिन मरीजों की स्क्रीनिंग रिपोर्ट पॉजिटिव या संदिग्ध आती है, उनकी दोबारा जांच, उपचार और नियमित निगरानी की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।
इसके लिए डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, समय पर रिमाइंडर और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल तथा विशेषज्ञ अस्पताल तक रेफरल सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत बताई जा रही है।
डायलिसिस से पहले रोकथाम पर जोर
वर्तमान व्यवस्था में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के जरिए अंतिम अवस्था में पहुंचे मरीजों को डायलिसिस उपलब्ध कराने पर जोर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके साथ बीमारी को शुरुआती चरण में रोकने पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।
शुरुआती CKD में ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का बेहतर नियंत्रण तथा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दवाओं के इस्तेमाल से बीमारी की प्रगति को धीमा किया जा सकता है।
डायबिटीज और हाई बीपी वालों की नियमित जांच जरूरी
KDIGO और अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन (ADA) की सिफारिशों में भी डायबिटीज से पीड़ित मरीजों में किडनी की नियमित जांच और जोखिम के अनुसार निगरानी पर जोर दिया गया है। विशेष रूप से डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों में किडनी की स्थिति की समय-समय पर जांच महत्वपूर्ण मानी जाती है।
किडनी खराब होने के प्रमुख कारण
भारत में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर किडनी खराब होने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसके अलावा मोटापा, असंतुलित खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी, दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक या जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, किडनी की पथरी, संक्रमण, ऑटोइम्यून और आनुवंशिक बीमारियां भी किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
दूषित पानी और बिना चिकित्सकीय सलाह के कुछ आयुर्वेदिक या हर्बल दवाओं का इस्तेमाल भी जोखिम बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज और हाई बीपी को नियंत्रित रखना, नियमित जांच कराना और दवाओं का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के अनुसार करना किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है।
समय रहते जांच से बच सकती है डायलिसिस की नौबत
किडनी की बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंचने तक अक्सर इसके स्पष्ट संकेत नहीं मिलते। यही वजह है कि बीमारी का पता लगने तक किडनी को काफी नुकसान हो चुका होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जोखिम वाले लोगों की नियमित स्क्रीनिंग शुरू होने से बीमारी को शुरुआती चरण में पकड़ा जा सकता है।
समय पर पहचान और उपचार से किडनी की कार्यक्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिल सकती है और कई मामलों में डायलिसिस की जरूरत को टाला या काफी देर तक टाला जा सकता है।


