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Music Therapy: गानों की धुन और शब्दों की लय से लौटेगी स्ट्रोक मरीजों की खोई आवाज

Music Therapy: गानों की धुन और शब्दों की लय से लौटेगी स्ट्रोक मरीजों की खोई आवाज

नई दिल्ली, 28 जुलाई। स्ट्रोक के बाद बोलने की क्षमता खो चुके मरीजों के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने इलाज का एक नया और अनोखा तरीका विकसित किया है। अब दवाओं और पारंपरिक स्पीच थेरेपी के साथ गानों की धुन, शब्दों की लय और हिंदी भाषा की ताल के माध्यम से मरीजों को दोबारा बोलने का अभ्यास कराया जा सकेगा। आईआईटी दिल्ली, एम्स दिल्ली और इहबास के शोधकर्ताओं ने मिलकर देश की पहली हिंदी मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी (एमआईटी) विकसित की है।

यह तकनीक विशेष रूप से स्ट्रोक के बाद होने वाली नॉन-फ्लुएंट एफेजिया से जूझ रहे मरीजों के लिए तैयार की गई है। इस स्थिति में मरीज अपनी बात समझने और बोलने की इच्छा रखने के बावजूद शब्दों को सहजता से बोल या वाक्यों में व्यक्त नहीं कर पाता। नई थेरेपी में संगीत और भाषा की लय का इस्तेमाल कर बोलने की क्षमता को दोबारा विकसित करने का प्रयास किया जाता है।

अब तक मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा को ध्यान में रखकर विकसित की गई थी। हिंदी में ध्वनियों, उच्चारण, शब्दों और वाक्यों की अपनी अलग लय को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने भारतीय मरीजों के लिए इसका स्वदेशी मॉडल तैयार किया है।

थेरेपी के दौरान मरीजों को धुन के साथ शब्द बोलने का अभ्यास कराया जाता है। इसके बाद छोटे-छोटे वाक्यों के जरिए बातचीत शुरू कराई जाती है और धीरे-धीरे सामान्य संवाद की क्षमता विकसित करने की कोशिश की जाती है। इस प्रक्रिया में संगीत की लय को बोलने की शुरुआत के लिए सहायक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

छह मरीजों पर हुआ शुरुआती अध्ययन

शोधकर्ताओं ने शुरुआती अध्ययन में छह स्ट्रोक मरीजों को शामिल किया। मरीजों को 45 से 60 मिनट के 40 थेरेपी सत्र दिए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार, थेरेपी के बाद सभी मरीजों में बोलने की क्षमता, आत्मविश्वास और दैनिक बातचीत में सुधार देखा गया।

आईआईटी दिल्ली के प्रमुख शोधकर्ता प्रो. राहुल गर्ग के मुताबिक, थेरेपी के बाद मरीज पहले की तुलना में लंबे वाक्य बोलने लगे और अपनी बात अधिक सहजता से व्यक्त कर सके। शोधकर्ताओं का मानना है कि संगीत की लय मरीजों को शब्दों और वाक्यों को बोलने की प्रक्रिया में सहारा दे सकती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विकसित होगी तकनीक

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक को अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसे मरीजों तक भी थेरेपी पहुंचाना है, जो बड़े अस्पतालों या विशेषज्ञ केंद्रों तक नियमित रूप से नहीं पहुंच सकते।

प्रो. एन.एम. अनूप कृष्णन ने बताया कि डिजिटल मॉडल तैयार होने के बाद दूर-दराज के मरीज घर के पास या ऑनलाइन माध्यम से भी इस हिंदी संगीत थेरेपी का लाभ उठा सकेंगे। इससे स्ट्रोक के बाद भाषा संबंधी पुनर्वास सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

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संवाददाता

Priyanka Singh

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