Brain Stroke: ब्रेन स्ट्रोक से बचना है तो ‘समय’ को बचाइए, हर मिनट में बच सकता है दिमाग, एम्स में विशेषज्ञों ने दिया संदेश

Brain Stroke: ब्रेन स्ट्रोक से बचना है तो ‘समय’ को बचाइए, हर मिनट में बच सकता है दिमाग, एम्स में विशेषज्ञों ने दिया संदेश

नई दिल्ली, 17 अगस्त। ब्रेन स्ट्रोक अचानक होता है, लेकिन समय रहते इसकी पहचान और तत्काल इलाज शुरू होने पर इससे होने वाली स्थायी अपंगता और दिमागी क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मरीज को स्ट्रोक के शुरुआती संकेत दिखाई देने के तुरंत बाद अस्पताल पहुंचाना उपचार की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी संदेश को प्रमुखता से सामने रखते हुए एम्स दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग ने ‘सेव द ब्रेन – स्ट्रोक से बचाव और इलाज संभव है’ विषय पर सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम (CME) का आयोजन किया।

कार्यक्रम में देशभर से बड़ी संख्या में स्वास्थ्य विशेषज्ञों और स्वास्थ्य पेशेवरों ने हिस्सा लिया। इस दौरान स्ट्रोक की रोकथाम, जोखिम कारकों की पहचान, शुरुआती लक्षणों को समझने, तत्काल उपचार उपलब्ध कराने और मरीजों के पुनर्वास की व्यवस्था को मजबूत करने पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘भारत में स्ट्रोक केयर का विस्तार – रोकथाम से लेकर एडवांस्ड इलाज तक’ रखा गया। विशेषज्ञों ने कहा कि स्ट्रोक के खिलाफ प्रभावी रणनीति केवल अस्पताल में इलाज तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए रोकथाम से लेकर पुनर्वास और जन-जागरूकता तक एक मजबूत नेटवर्क तैयार करना जरूरी है।

एम्स के निदेशक प्रो. निखिल टंडन ने कहा कि स्ट्रोक चिकित्सा की सोच अब केवल मरीज में न्यूरोलॉजिकल कमी की पहचान करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। चिकित्सा व्यवस्था का वास्तविक लक्ष्य दिमाग के बचे हुए कार्यों को अधिक से अधिक सुरक्षित रखना होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यूरोलॉजी में उपचार की सफलता को केवल खोए हुए ब्रेन फंक्शन के आधार पर नहीं, बल्कि बचे हुए ब्रेन फंक्शन को सुरक्षित रखने और बेहतर करने की क्षमता के आधार पर भी समझने की आवश्यकता है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक आराधना पटनायक ने स्ट्रोक की रोकथाम और समय पर उपचार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने लोगों में स्ट्रोक के जोखिम कारकों की जांच, शुरुआती लक्षणों की पहचान और मरीज को समय पर उचित चिकित्सा केंद्र तक रेफर करने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई। विशेषज्ञों के अनुसार उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अस्वास्थ्यकर जीवनशैली और अन्य जोखिम कारकों को नियंत्रित करना स्ट्रोक की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

नीति आयोग के सदस्य प्रो. एम. श्रीनिवास ने कहा कि स्ट्रोक के खिलाफ लड़ाई को केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए रोकथाम, शुरुआती पहचान, इमरजेंसी उपचार, पुनर्वास और जन-जागरूकता को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने 12 आकांक्षी जिलों में नीति आयोग की ब्रेन-हेल्थ पहल का भी उल्लेख किया। इसका उद्देश्य देश के विभिन्न हिस्सों में मस्तिष्क स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं और जागरूकता को मजबूत करने की दिशा में काम करना है।

एम्स के न्यूरो इमेजिंग एवं इंटरवेंशनल न्यूरोरेडियोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. शैलेश बी. गायकवाड़ ने देशभर में स्ट्रोक इंटरवेंशन सेवाओं के विस्तार की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक स्ट्रोक उपचार को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए इंटरवेंशनल सेवाओं का नेटवर्क मजबूत करना जरूरी है। साथ ही उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत स्वदेशी न्यूरो वैस्कुलर उपकरणों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई, ताकि उन्नत उपचार तकनीक और आवश्यक चिकित्सा उपकरण देश में अधिक व्यापक स्तर पर उपलब्ध हो सकें।

कार्यक्रम में प्रो. मंजरी त्रिपाठी, प्रो. अचल के. श्रीवास्तव और डॉ. विक्रम हुड्डेड सहित कई विशेषज्ञों ने स्ट्रोक की रोकथाम और उपचार से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। चर्चा में इस बात पर विशेष जोर रहा कि स्ट्रोक के मरीज के लिए उपचार का हर चरण समय से जुड़ा होता है। शुरुआती पहचान और अस्पताल पहुंचने में होने वाली देरी मरीज के उपचार के परिणामों को प्रभावित कर सकती है।

डॉ. अवध किशोर पंडित ने कहा कि स्ट्रोक के मामले में हर मिनट महत्वपूर्ण है। उन्होंने लोगों को इसके प्रमुख चेतावनी संकेतों के प्रति जागरूक रहने की सलाह दी। चेहरे का अचानक एक तरफ टेढ़ा होना, हाथ या पैर में अचानक कमजोरी या सुन्नपन और बोलने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई देने पर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसे संकेतों के सामने आते ही मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना जरूरी है।

विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि स्ट्रोक के मामले में केवल इलाज उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। मरीज को सही समय पर सही चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाने के लिए परिवार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, एंबुलेंस सेवाओं और विशेषज्ञ अस्पतालों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। इसके साथ ही उपचार के बाद पुनर्वास की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी, ताकि मरीज अपनी दैनिक गतिविधियों और जीवन की गुणवत्ता को अधिकतम संभव स्तर तक वापस पा सके।

एम्स में आयोजित इस सीएमई के माध्यम से देश में स्ट्रोक के खिलाफ एक व्यापक और समन्वित स्वास्थ्य नेटवर्क विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों का संदेश स्पष्ट रहा कि स्ट्रोक के इलाज में समय सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है। लक्षणों की जल्द पहचान, तत्काल अस्पताल पहुंचना, आधुनिक उपचार और समय पर पुनर्वास के जरिए दिमाग को होने वाली क्षति और स्थायी अपंगता के जोखिम को कम किया जा सकता है।

 

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