Akhlaq Lynching Case: अखलाक मॉब लिंचिंग केस की सुनवाई 23 जनवरी तक टली, वृंदा करात बोलीं—न्याय के साथ मजाक कर रही सरकार

Akhlaq Lynching Case: अखलाक मॉब लिंचिंग केस की सुनवाई 23 जनवरी तक टली, वृंदा करात बोलीं—न्याय के साथ मजाक कर रही सरकार

नोएडा। थाना जारचा क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव में हुए चर्चित अखलाक मॉब लिंचिंग मामले में गौतमबुद्ध नगर की अपर जिला न्यायालय में बुधवार को सुनवाई हुई। पिछली तारीख पर अदालत द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार की केस वापस लेने की अर्जी खारिज किए जाने के बाद आज पीड़ित पक्ष को गवाही के लिए बुलाया गया था। निर्धारित समय पर मृतक अखलाक की पत्नी और पुत्र अदालत में उपस्थित हुए। इस दौरान सीपीआई (एम) की राष्ट्रीय नेत्री और पूर्व राज्यसभा सांसद कामरेड वृंदा करात भी पीड़ित परिवार के साथ कोर्ट पहुंचीं।

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने अदालत को अवगत कराया कि सरकार ने केस वापस लेने की अर्जी खारिज किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है। इसके साथ ही आरोपियों की ओर से केस के स्थानांतरण को लेकर दिया गया आवेदन भी अभी लंबित है। इन दोनों कारणों का हवाला देते हुए सरकारी वकील ने सुनवाई को फिलहाल स्थगित रखने का अनुरोध किया। आरोपियों के वकील ने भी इस मांग का समर्थन किया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख 23 जनवरी तय कर दी।

कोर्ट परिसर में मीडिया से बातचीत करते हुए कामरेड वृंदा करात ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि इस मामले में सरकार को पीड़ित परिवार के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए था, लेकिन आज की सुनवाई के दौरान सत्ता पक्ष और आरोपियों के बीच साफ तौर पर तालमेल दिखाई दिया। उन्होंने इसे न्याय प्रक्रिया का मजाक करार देते हुए कहा कि जब एक जघन्य अपराध के मामले में भी सरकार पीड़ितों की बजाय आरोपियों के हित में कदम उठाती है, तो इससे न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

वृंदा करात ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे देश की अंतरात्मा से जुड़ा हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बार-बार कानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लेकर मामले को कमजोर करने और आरोपियों को राहत देने का प्रयास कर रही है। इस दौरान उनके साथ सीपीआई (एम) के जिला सचिव कामरेड रामसागर, सीटू जिला महासचिव रामस्वारथ, जिला सचिव गंगेश्वर दत्त शर्मा, जिला कमेटी सदस्य सुखलाल और अरुण कुमार पटेल, लॉयर्स यूनियन के नेता एडवोकेट अरुण प्रताप सिंह, अखलाक के अधिवक्ता मोहम्मद यूसुफ सैफी और अदवी नकवी सहित कई अन्य लोग भी मौजूद रहे।

गौरतलब है कि लगभग 10 वर्ष पहले 28 सितंबर 2015 को बिसाहड़ा गांव में एक अफवाह के बाद उग्र भीड़ ने 50 वर्षीय मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। भीड़ का आरोप था कि अखलाक के परिवार ने बछड़े की हत्या कर गोमांस खाया और घर में गोमांस रखा हुआ है। इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया था और मॉब लिंचिंग के मामलों को लेकर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई थी।

पुलिस जांच के बाद इस मामले में कुल 19 लोगों को आरोपी बनाया गया था। सभी आरोपियों के खिलाफ हत्या, दंगा भड़काने और जान से मारने की धमकी जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। मामला वर्षों से अदालत में विचाराधीन है।

इस केस ने एक बार फिर तब सुर्खियां बटोरीं जब अक्टूबर 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार ने अचानक अदालत में आवेदन देकर आरोपियों के खिलाफ चल रहे मुकदमे को वापस लेने की अनुमति मांगी। सरकार की इस मांग पर देशभर में सवाल उठे और अदालत ने पिछली सुनवाई में इस अर्जी को खारिज कर दिया। अब सरकार द्वारा हाईकोर्ट में अपील किए जाने के बाद मामला एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। अगली सुनवाई 23 जनवरी को होगी, जिस पर पीड़ित परिवार और सामाजिक संगठनों की निगाहें टिकी हैं।

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