
AI Smart Glasses: एआई आधारित चश्मों से 90% दृष्टिबाधितों की दृष्टि में सुधार की उम्मीद, चेहरों की पहचान भी संभव – एम्स
नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में All India Institute of Medical Sciences के आरपी सेंटर ने एआई आधारित स्मार्ट विजन चश्मों का वितरण कर दृष्टिबाधितों के लिए नई उम्मीद जगाई है। विशेषज्ञों का दावा है कि इन अत्याधुनिक चश्मों की मदद से गंभीर दृष्टिबाधित लोगों की कार्यात्मक दृष्टि में 90 प्रतिशत तक सुधार संभव है, जिससे वे चेहरों की पहचान, वस्तुओं को समझने और सुरक्षित तरीके से चलने-फिरने में सक्षम हो सकेंगे।
देश में लगभग एक करोड़ लोग अंधता या गंभीर दृष्टि बाधा से प्रभावित हैं, जिनमें बुजुर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की संख्या अधिक है। आरपी सेंटर के प्रोफेसर डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने बताया कि समय पर उपचार और अपवर्तक त्रुटियों के सुधार से अंधत्व के कई मामलों को रोका जा सकता है। हालांकि, करीब 7 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं जो ग्लूकोमा, डायबिटिक रेटिनोपैथी, आयु-संबंधी मैक्युलर डिजनरेशन और अन्य रेटिना संबंधी रोगों के कारण स्थायी रूप से 90 प्रतिशत तक दृष्टि हानि झेल चुके हैं। ऐसे मरीजों के लिए एआई आधारित सहायक तकनीक जीवन बदलने वाली साबित हो सकती है।
‘प्रोजेक्ट दृष्टि’ के अंतर्गत आरपी सेंटर के लेक्चर थियेटर नंबर 6 में 53 लाभार्थियों—बच्चों, वयस्कों और बुजुर्गों—को एआई संचालित स्मार्ट चश्मे वितरित किए गए। इनमें 25 बच्चे नेत्रहीन विद्यालय के 10 वर्ष से अधिक आयु के छात्र थे, जो स्मार्टफोन या एंड्रॉयड मोबाइल चलाने में सक्षम हैं। इस पहल का उद्देश्य तकनीक के माध्यम से दृष्टिबाधितों को अधिक आत्मनिर्भर बनाना है ताकि वे शिक्षा, रोजगार और दैनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
यह पहल रोटरी क्लब द्वारा विजन-ऐड और एसएचजी टेक्नोलॉजी के सहयोग से एम्स दिल्ली के साथ मिलकर संचालित की गई। स्मार्ट चश्मों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रियल-टाइम ऑब्जेक्ट पहचान, टेक्स्ट-टू-स्पीच फीचर, चेहरे की पहचान, डिजिटल रीडिंग सपोर्ट और नेविगेशन सहायता जैसी उन्नत सुविधाएं शामिल हैं। उपयोगकर्ता किसी व्यक्ति के सामने आने पर उसका नाम सुन सकते हैं, लिखित सामग्री को ऑडियो में परिवर्तित कर सकते हैं और आसपास की वस्तुओं की पहचान कर सुरक्षित रूप से आगे बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक केवल सहायक उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक समावेशन का माध्यम है। लाभार्थियों को उपकरण के उपयोग के लिए विशेष प्रशिक्षण और निरंतर तकनीकी सहायता भी प्रदान की जाएगी, ताकि वे इसे प्रभावी ढंग से अपने दैनिक जीवन में अपना सकें।
एम्स के चिकित्सकों का कहना है कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो देश में दृष्टिबाधितों के जीवन स्तर में व्यापक सुधार संभव है। एआई आधारित समाधान न केवल चिकित्सा क्षेत्र में बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के समग्र ढांचे को भी मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।
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