Himachal Pradesh Grazing Policy 2026: हिमाचल प्रदेश चराई नीति-2026 को मंजूरी, पशुपालकों की आजीविका और पर्यावरण संरक्षण को मिलेगा नया आधार

Himachal Pradesh Grazing Policy 2026: हिमाचल प्रदेश चराई नीति-2026 को मंजूरी, पशुपालकों की आजीविका और पर्यावरण संरक्षण को मिलेगा नया आधार
शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार ने पशुपालकों की आजीविका को सशक्त बनाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ‘हिमाचल प्रदेश चराई नीति-2026’ को मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में तैयार की गई यह नीति राज्य में चराई प्रबंधन व्यवस्था में व्यापक सुधार लाने के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन और आर्थिक विकास के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। नई नीति के तहत पारंपरिक और कठोर प्रतिबंधों वाली व्यवस्था के स्थान पर वैज्ञानिक, व्यावहारिक और लचीले दृष्टिकोण को अपनाया जाएगा। सरकार का मानना है कि जिम्मेदार और नियंत्रित चराई न केवल घासभूमियों की उत्पादकता बनाए रखने में सहायक होती है, बल्कि मिट्टी में कार्बन भंडारण बढ़ाने, जैव विविधता के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वन विभाग और पशुपालन विभाग मिलकर एक व्यापक ऑनलाइन पोर्टल विकसित करेंगे। अगले छह माह के भीतर राज्य के सभी पशुपालकों को इस पोर्टल पर अपना नाम, पता, पशुओं की संख्या, पारंपरिक चराई मार्ग और पड़ाव स्थलों का विवरण दर्ज कराना होगा। इस डिजिटल प्रणाली को हिम परिवार और भारत पशुधन पोर्टल से जोड़ा जाएगा, जिससे पशुपालकों की पहचान और पशुधन संबंधी विवरण का सत्यापन पारदर्शी और आसान तरीके से किया जा सकेगा। नई चराई नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि उन पारंपरिक पशुपालकों को भी औपचारिक मान्यता दी जाएगी जो वर्षों से बिना किसी सरकारी अनुमति के चराई गतिविधियों में लगे हुए हैं। ऐसे पशुपालक अब पंजीकरण कराकर अपनी पहचान दर्ज करा सकेंगे। इसके बाद स्थानीय स्तर पर गठित चराई सलाहकार समितियां उनके मामलों की समीक्षा कर नियमों के अनुसार नए चराई परमिट जारी करेंगी। चराई परमिट जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर तैयार किया गया है। इसके तहत चरागाहों की उपलब्धता, वन क्षेत्रों की वहन क्षमता, वन्यजीवों की आवश्यकताओं, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत आकलन किया जाएगा। इसके आधार पर ही चराई की अनुमति प्रदान की जाएगी, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव न पड़े। वन क्षेत्रों के संरक्षण और पुनर्जीवन को सुनिश्चित करने के लिए नीति में क्रमबद्ध चराई व्यवस्था यानी रोटेशनल ग्रेजिंग का प्रावधान भी किया गया है। इस व्यवस्था के तहत अलग-अलग क्षेत्रों में निर्धारित अवधि के अनुसार चराई गतिविधियां संचालित की जाएंगी, जिससे घासभूमियों को पुनर्जीवित होने का पर्याप्त समय मिल सके। चराई सलाहकार समितियां समय-समय पर इन गतिविधियों की समीक्षा करेंगी और आवश्यक सुझाव देंगी। इन समितियों में स्थानीय और प्रवासी पशुपालकों, पंचायत प्रतिनिधियों, विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों, ऊन संघ के प्रतिनिधियों तथा वन विभाग के अधिकारियों को शामिल किया जाएगा। वन संरक्षक और जिला वन अधिकारी की अध्यक्षता में कार्य करने वाली ये समितियां प्रत्येक पांच वर्ष में पर्यावरणीय परिस्थितियों और चराई की स्थिति के आधार पर परमिटों की समीक्षा करेंगी। नीति में यह भी प्रावधान किया गया है कि जिन चराई परमिटों का लंबे समय से उपयोग नहीं हो रहा है या जो ऐसे व्यक्तियों के नाम पर हैं जो वास्तव में चराई गतिविधियों में शामिल नहीं हैं, उन्हें जांच के बाद निरस्त किया जाएगा। इसके पश्चात उपलब्ध चराई क्षमता को ग्राम सभाओं के माध्यम से वास्तविक और सक्रिय पशुपालकों को आवंटित किया जाएगा, जिससे संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग सुनिश्चित हो सके। सरकार ने पारंपरिक चरवाहों, जिन्हें स्थानीय रूप से ‘पोहाल’ कहा जाता है, को भी इस नीति में विशेष स्थान दिया है। इन्हें राज्य के आधिकारिक पोर्टल में पंजीकृत कर उनकी सुरक्षा, सामाजिक पहचान और आजीविका को संरक्षण प्रदान किया जाएगा। पारंपरिक चराई विरासत को संरक्षित रखने के लिए नीति में प्रवासी चराई मार्गों, जल स्रोतों और पड़ाव स्थलों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया है। इन सभी मार्गों और स्थलों का विशेष मानचित्रण कर जियो-टैग किया जाएगा, ताकि भविष्य में विकास परियोजनाओं के कारण इन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इसके अलावा सात वर्ष से अधिक पुराने वनरोपण क्षेत्रों में नियंत्रित और नियोजित चराई की अनुमति दी जाएगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक पशुपालन गतिविधियों के बीच संतुलन बना रहे। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि चराई नीति-2026 राज्य सरकार की ‘हरियाली भी, खुशहाली भी’ की सोच को साकार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि यह नीति एक ओर राज्य के चरागाहों और वन संसाधनों की रक्षा करेगी, वहीं दूसरी ओर पशुपालक समुदाय की परंपराओं का सम्मान करते हुए उनके आर्थिक भविष्य को भी सुरक्षित बनाएगी। मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि नई चराई नीति पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और ग्रामीण समृद्धि के बीच संतुलन स्थापित करते हुए हिमाचल प्रदेश में एक समावेशी, टिकाऊ और सशक्त पशुपालन अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव रखेगी। इससे हजारों पशुपालक परिवारों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों के सतत विकास को नई दिशा प्राप्त होगी।





