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RSS Centenary Event: “राष्ट्र प्रथम” ही हर आंतरिक समस्या का समाधान – इंद्रेश कुमार

RSS Centenary Event: “राष्ट्र प्रथम” ही हर आंतरिक समस्या का समाधान – इंद्रेश कुमार

रिपोर्ट: रवि डालमिया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में राष्ट्रवादी चिकित्सक संघ द्वारा दिल्ली के दरियागंज स्थित Delhi Medical Association हॉल में “चिकित्सक सामाजिक पथप्रदर्शक” विषय पर प्रश्नोत्तरी एवं जिज्ञासा समाधान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम माननीय इंद्रेश कुमार के सानिध्य में संपन्न हुआ, जिसमें दिल्ली और आसपास के 200 से अधिक प्रख्यात चिकित्सकों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम के दौरान देश और समाज से जुड़े विभिन्न समसामयिक विषयों पर गंभीर और प्रखर चर्चा हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं राष्ट्र चिंतक इंद्रेश कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि “राष्ट्र प्रथम” की भावना ही देश की समस्त आंतरिक समस्याओं का स्थायी समाधान है। उन्होंने समाज से जातिगत विभाजनों से ऊपर उठकर एकजुट होने और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया।

अपने उद्बोधन में उन्होंने लव जिहाद, जनसंख्या संतुलन, बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार और अखंड भारत जैसे विषयों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ किए बिना भारत की पूर्ण शक्ति प्रकट नहीं हो सकती। इंद्रेश कुमार ने संगठन, संवाद और सकारात्मक राष्ट्रचिंतन को समाज की चुनौतियों का समाधान बताया और सभी वर्गों से राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की अपील की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. ममता त्यागी ने की। उन्होंने भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप का उल्लेख करते हुए शक्ति और प्रकृति के संगम से उत्पन्न ऊर्जा को ब्रह्मांडीय संतुलन का आधार बताया। उन्होंने कहा कि समाज में संतुलन, संवेदनशीलता और समरसता का निर्माण स्त्री-पुरुष की समान सहभागिता से ही संभव है। कार्यक्रम की शुरुआत महिला चिकित्सकों द्वारा महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के सामूहिक गायन से हुई और समापन वंदे मातरम् के सामूहिक गायन के साथ हुआ।

इस अवसर पर डॉ. मीनाक्षी काव, डॉ. ऋतु सिंह, डॉ. मोनिका अग्रवाल, डॉ. गिरीश त्यागी, डॉ. सुनील शांगलू, डॉ. सचिन गुप्ता, डॉ. अर्णव बंसल, डॉ. वीरभद्र यादव, डॉ. अश्वनी गोयल, डॉ. प्राची और डॉ. सुधा शर्मा सहित अनेक चिकित्सक उपस्थित रहे। कार्यक्रम को वैचारिक विमर्श और सामाजिक मार्गदर्शन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा गया।

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