Forest Economy: हिमाचल में 22,600 करोड़ की वन अर्थव्यवस्था की क्षमता, वन विभाग और आईएसबी के बीच पांच साल का समझौता
शिमला। हिमाचल प्रदेश की वन एवं चरागाह आधारित अर्थव्यवस्था की अप्रयुक्त संभावनाओं को विकसित करने के लिए हिमाचल प्रदेश वन विभाग और भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी-बीआईपीपी) के बीच पांच वर्ष का समझौता ज्ञापन (एमओयू) हुआ है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू की मौजूदगी में हुए इस समझौते का उद्देश्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्थानीय समुदायों और सरकारी व्यवस्था को जोड़कर वन संसाधनों की आर्थिक क्षमता का टिकाऊ तरीके से उपयोग करना है।
एमओयू पर वन विभाग की ओर से प्रधान मुख्य अरण्यपाल डॉ. संजय सूद और भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, आईएसबी की ओर से कार्यकारी निदेशक प्रो. अश्विनी छत्रे ने हस्ताक्षर किए। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह साझेदारी हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और इससे आने वाले वर्षों में प्रदेश को व्यापक लाभ मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार स्थानीय वन प्रजातियों की आर्थिक क्षमता का अधिकतम उपयोग करने पर ध्यान दे रही है। हरड़ और बेल जैसी औषधीय वनस्पतियों के अलावा थांगी यानी हेजलनट के पोषण एवं व्यावसायिक महत्व का भी विस्तृत आकलन किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य वन संसाधनों का ऐसा उपयोग सुनिश्चित करना है, जिससे स्थानीय समुदायों को आर्थिक लाभ मिले और पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहे।
एमओयू पर हस्ताक्षर से पहले आईएसबी-बीआईपीपी की टीम ने संयुक्त वन सर्वेक्षण के निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए। सर्वेक्षण के दौरान 500 से अधिक वन रक्षकों ने दो लाख से अधिक पेड़ों से संबंधित आंकड़े और प्रजातियों की पहचान वाली तस्वीरें एकत्र कीं। इन आंकड़ों को सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा मशीन लर्निंग तकनीक से जोड़ा गया। इसके बाद मौके पर जाकर आंकड़ों का सत्यापन किया गया।
सर्वेक्षण के आधार पर खैर, बांस, चीड़, आंवला, जंगली आम, साल और बुरांश सहित सात प्रजातियों के मानचित्र तैयार किए गए हैं। इस पूरे कार्य को संयुक्त रूप से ‘काउंटिंग ग्रीन वेल्थ’ के नाम से प्रकाशित किया गया है। सर्वेक्षण में पांच प्रमुख जैव-संसाधनों में कुल 22,600 करोड़ रुपये की अप्रयुक्त आर्थिक क्षमता का अनुमान लगाया गया है।
आकलन के अनुसार आंवला की संभावित आर्थिक कीमत करीब 8,700 करोड़ रुपये, चीड़ की पत्तियों की 5,500 करोड़ रुपये, जंगली आम की 4,800 करोड़ रुपये, साल के बीज की 2,400 करोड़ रुपये और बुरांश के फूलों की 1,200 करोड़ रुपये आंकी गई है। हालांकि, इन संसाधनों के दोहन को प्रत्येक प्रजाति की पर्यावरणीय क्षमता और टिकाऊ उपयोग की सीमा तक ही सीमित रखने पर जोर दिया गया है।
इस पहल में स्थानीय समुदायों और महिला नेतृत्व वाले उद्यमों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना गया है। पांगी की पीर पंजाल जंगल प्रोड्यूसर कंपनी को इसका सफल उदाहरण बताया गया। महिलाओं के स्वामित्व वाली यह कंपनी थांगी के कारोबार से जुड़ी है। सर्वेक्षण से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल पालमपुर वन मंडल की कार्ययोजना में पहले ही किया जा रहा है। इसे प्रदेश के अन्य वन मंडलों तक विस्तार देने की योजना है।
एमओयू के तहत वन अर्थव्यवस्था और सामुदायिक उद्यमों को बढ़ावा देना, महिला नेतृत्व वाली उत्पादक कंपनियों को बाजार से जोड़ना, फॉरेस्ट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म विकसित करना, चराई पोर्टल और चरागाह आधारित डेटाबेस तैयार करना तथा वन विभाग के कर्मचारियों और उत्पादक कंपनियों का प्रशिक्षण एवं क्षमता विकास शामिल है।
फॉरेस्ट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म को पहले पालमपुर में शुरू किया जाएगा और बाद में इसे पूरे प्रदेश में लागू करने की योजना है। वहीं चराई पोर्टल और चरागाह आधारित डेटाबेस को हिमाचल प्रदेश ग्रेजिंग पॉलिसी-2026 के तहत आधार, हिम परिवार, भारत पशुधन और पहल योजना से जोड़ने का प्रस्ताव है।
भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, आईएसबी के कार्यकारी निदेशक प्रो. अश्विनी छत्रे ने कहा कि वैज्ञानिक शोध को जमीनी अनुभव से जोड़ने पर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि 500 से अधिक वन रक्षकों द्वारा कई महीनों तक जुटाए गए आंकड़ों ने आर्थिक आकलन को मजबूत और विश्वसनीय आधार दिया है।
आईएसबी-बीआईपीपी की निदेशक डॉ. आरुषि जैन ने कहा कि सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़े केवल रिपोर्ट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका इस्तेमाल पालमपुर की कार्ययोजना तैयार करने में किया जा रहा है। एमओयू के माध्यम से वैज्ञानिक जानकारी और चरागाह संबंधी डेटाबेस को पूरे हिमाचल प्रदेश में विस्तार दिया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल विज्ञान, स्थानीय समुदायों और सरकार को एक साथ जोड़कर वन प्रबंधन में व्यापक बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वन संसाधनों की आर्थिक क्षमता का टिकाऊ उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा कर सकता है। सरकार का प्रयास है कि वन आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए स्थानीय लोगों की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण दोनों को प्राथमिकता दी जाए।


