Mass Death Identification: आतंकी वारदात, दुर्घटना और आपदा में मृतकों की ससम्मान पहचान के प्रयास — मास डेथ घटनाओं में फोरेंसिक तकनीक बनी सबसे बड़ी उम्मीद

Mass Death Identification: आतंकी वारदात, दुर्घटना और आपदा में मृतकों की ससम्मान पहचान के प्रयास — मास डेथ घटनाओं में फोरेंसिक तकनीक बनी सबसे बड़ी उम्मीद
नई दिल्ली, 28 नवम्बर: आतंकवादी हमले, भीषण रेल हादसे, विमान दुर्घटनाएँ, भगदड़ की घटनाएँ और प्राकृतिक आपदाएँ अक्सर ऐसी त्रासदी लेकर आती हैं जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान चली जाती है। इन सामूहिक मौतों (Mass Death) में जहाँ एक ओर घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच जाती है, वहीं दूसरी ओर अंग-भंग, जली हुई या कुचली अवस्था में मिलने वाले शवों की पहचान करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। शवों की पहचान में देरी होने से परिजन दिनों तक शवागारों और अस्पतालों के चक्कर काटते रहते हैं और मानसिक, भावनात्मक तथा सामाजिक रूप से परेशान होते हैं। ऐसे कठिन समय में फोरेंसिक तकनीक न केवल मृतकों की पहचान सुनिश्चित करती है बल्कि शवों को पुनर्निर्मित कर उन्हें सम्मानजनक रूप भी प्रदान करती है ताकि परिजन अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक कर सकें।
एम्स नई दिल्ली के फोरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर दीपक गुप्ता ने कहा कि मास डेथ की स्थितियाँ भूकंप, बाढ़, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ प्लेन क्रैश, रेल हादसे, बम धमाके और भीड़ के कुचलने जैसी घटनाओं में उत्पन्न होती हैं। उन्होंने कहा कि हर मृत व्यक्ति को सम्मान देना मानवता का कर्तव्य है, चाहे उनकी मौत जिस कारण से हुई हो और चाहे शरीर जिस भी अवस्था में अस्पताल पहुंचे।
प्रोफेसर गुप्ता ने बताया कि कई बार धमाके या दुर्घटना के बाद शरीर के अंग एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, पहचान योग्य नहीं रहते और शव पूरी तरह क्षत-विक्षत हो जाते हैं। ऐसे में फोरेंसिक विशेषज्ञ अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर शवों का पुनर्निर्माण (Reconstruction) करते हैं ताकि उनके परिजन अपने प्रियजन को सम्मानजनक रूप में पहचान सकें। उन्होंने 2011 दिल्ली हाईकोर्ट बम ब्लास्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि उस घटना के दौरान शरीर के विभिन्न हिस्से बिखरे पड़े मिले थे। फोरेंसिक टीम ने उन हिस्सों को एकत्र किया, शरीरों को रिकंस्ट्रक्ट किया और फिर परिवारों को सम्मानपूर्वक सौंपा। यह काम भले ही पर्दे के पीछे होता है, लेकिन बेहद मानवीय और संवेदनशील है।
प्रो. गुप्ता ने बताया कि इंटरनेशनल रेड क्रॉस सोसाइटी के सहयोग से आयोजित एक कार्यशाला में रेल और विमान दुर्घटनाओं, बम धमाकों और प्राकृतिक आपदा की स्थितियों में बड़े पैमाने पर शवों को संभालने और पहचान सुनिश्चित करने की रणनीति पर चर्चा की जा रही है। सोसाइटी एम्स को एक तेज, आधुनिक और सुव्यवस्थित सिस्टम विकसित करने में सहायता प्रदान कर रही है।
उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम प्रक्रिया में वर्चुअल ऑटोप्सी (Virtual Autopsy) को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें शरीर को काटने के बजाय एडवांस स्कैनिंग तकनीक (जैसे CT और MRI स्कैन) का उपयोग किया जाता है। इससे मृतक के शरीर को बिना किसी शारीरिक कटाव के सुरक्षित रखा जा सकता है और पहचान प्रक्रिया अधिक सरल और सम्मानजनक बन जाती है।
राष्ट्रीय स्तर पर ‘आपदा मुर्दाघर’ की जरूरत
प्रो. गुप्ता ने राष्ट्रीय स्तर पर एक National Disaster Mortuary स्थापित करने का सुझाव दिया जिसमें एक समय में 400 तक शव सुरक्षित रखने और उनकी पहचान की आधुनिक व्यवस्था उपलब्ध हो। उन्होंने कहा कि ऐसे मुर्दाघर को विमानतल के पास स्थापित किया जाना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर शवों को हवाई मार्ग से तुरंत भेजा जा सके और पीड़ित परिवारों को राहत मिल सके। उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ऐसी मॉडर्न आपदा मॉर्चरी पहले से मौजूद हैं, जिनमें विक्टोरिया फोरेंसिक इंस्टीट्यूट एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सामूहिक मृत्यु की किसी भी स्थिति में सबसे जरूरी है — शवों की तेजी से पहचान, सुरक्षित संरक्षा और ससम्मान अंतिम संस्कार। यही व्यवस्था पीड़ित परिवारों को भावनात्मक राहत देती है और राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन को अधिक मानवीय और प्रभावी बनाती है।
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