Wilson Disease Treatment India: दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी विल्सन रोग के खिलाफ आईएलबीएस ने छेड़ी निर्णायक जंग

Wilson Disease Treatment India: दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी विल्सन रोग के खिलाफ आईएलबीएस ने छेड़ी निर्णायक जंग

इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (आईएलबीएस) ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी विल्सन रोग से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों को सशक्त बनाने की दिशा में एक अहम पहल की है। नई दिल्ली में आईएलबीएस द्वारा विल्सन डिजीज पेशेंट एडवोकेसी प्रोग्राम की शुरुआत की गई, जिसका उद्देश्य बीमारी की समय पर पहचान, सही इलाज और आजीवन देखभाल को लेकर जागरूकता बढ़ाना है। यह कार्यक्रम मरीजों के साथ-साथ डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को एक मंच पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

विल्सन रोग एक दुर्लभ लेकिन गंभीर आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर में तांबा जरूरत से ज्यादा मात्रा में जमा होने लगता है। सामान्य स्थिति में तांबा शरीर से बाहर निकल जाता है, लेकिन इस रोग में यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इसका सीधा असर लिवर पर पड़ता है और समय के साथ लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। कई मामलों में मरीजों को चलने-फिरने, बोलने और मानसिक संतुलन से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

चिकित्सकीय आंकड़ों के अनुसार विल्सन रोग लगभग हर 30,000 में से एक बच्चे या युवा को प्रभावित करता है। चूंकि इसके शुरुआती लक्षण सामान्य लिवर या न्यूरोलॉजिकल बीमारियों जैसे होते हैं, इसलिए कई बार इसका पता देर से चलता है। आईएलबीएस हर साल 25 से 30 नए विल्सन रोग के मामलों का इलाज करता है और देश में इस बीमारी के उपचार के लिए इसे एक प्रमुख रेफरल सेंटर माना जाता है।

आईएलबीएस के बाल हेपेटोलॉजी विभाग की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में दुनिया भर से करीब 85 विशेषज्ञ और 110 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन के दौरान विल्सन रोग की उन्नत जांच तकनीकों, जेनेटिक टेस्टिंग, शुरुआती निदान और नई उपचार रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अगर बीमारी का समय पर पता चल जाए और नियमित दवाएं ली जाएं, तो मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।

कार्यक्रम का उद्घाटन नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर विनोद के. पॉल ने किया। उन्होंने कहा कि दुर्लभ रोगों में सबसे बड़ी चुनौती समय पर निदान, सही जानकारी और आजीवन इलाज की उपलब्धता है। उन्होंने इसे सकारात्मक बदलाव बताया कि अब विल्सन रोग की प्रमुख दवा ट्राइएन्टीन भारत में उपलब्ध है। पहले यह दवा विदेशों से बेहद महंगे दामों पर मंगानी पड़ती थी, लेकिन अब सरकार और फार्मा उद्योग के सहयोग से यह दवा विदेशों की तुलना में लगभग सौवें हिस्से की कीमत पर मरीजों को मिल रही है।

आईएलबीएस के निदेशक प्रोफेसर शिव कुमार सरीन ने इस पहल को विल्सन रोग से पीड़ित मरीजों के लिए एक बड़ा वरदान बताया। उन्होंने कहा कि सही दवा, नियमित फॉलोअप और जागरूकता के जरिए इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आईएलबीएस भविष्य में मरीजों के लिए सपोर्ट ग्रुप, काउंसलिंग और रिसर्च आधारित इलाज को और मजबूत करेगा।

आईएलबीएस की यह पहल न केवल विल्सन रोग के इलाज को नई दिशा देगी, बल्कि दुर्लभ बीमारियों को लेकर देश में जागरूकता और नीति स्तर पर ठोस कदम उठाने में भी सहायक साबित होगी।

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