Child Emotional Health: बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर कर रहा सोशल मीडिया – खतरनाक असर और बढ़ती चिंताएं

Child Emotional Health: बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर कर रहा सोशल मीडिया – खतरनाक असर और बढ़ती चिंताएं
नई दिल्ली, 12 दिसंबर: सोशल मीडिया जहां दुनिया को तेज़ी से जोड़ने का काम कर रहा है, वहीं इसके दुष्प्रभाव सबसे अधिक बच्चों और किशोरों पर पड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया की लगातार बढ़ती लत बच्चों को भावनात्मक और मानसिक रूप से कमजोर बना रही है, उनकी सामाजिक व्यवहार दक्षता घटा रही है और उन्हें वास्तविक दुनिया से काट रही है। मोबाइल स्क्रीन पर घंटों बिताने की आदत बच्चों के दिमागी विकास पर गहरा असर डाल रही है, जिससे वे उम्र से पहले ही मानसिक दबाव झेलने लगते हैं।
इंटरनेट और स्मार्टफोन के आने के बाद हर उम्र का व्यक्ति सोशल मीडिया का उपयोग कर रहा है, लेकिन सबसे अधिक प्रभाव 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर देखा जा रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर से एक नया कानून लागू किया है, जिसके तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से रोक दिया गया है। इस फैसले को लेकर भारत में मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, लेकिन बड़ी संख्या में भारतीय माता-पिता ऐसे ही कड़े कानून के समर्थन में दिख रहे हैं।
राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर लोकेश सिंह शेखावत बताते हैं कि सोशल मीडिया पर बच्चों के सामने कई बार ऐसे वीडियोज़ या कंटेंट आ जाते हैं, जिन्हें समझना उनकी मानसिक क्षमता से बाहर होता है। यह कंटेंट या तो उन्हें भ्रमित करता है या फिर सीधे उनके दिमाग पर नकारात्मक असर डाल देता है। कई बार बच्चे घंटों रील्स और शॉर्ट वीडियोज़ देखते रहते हैं, जिससे उनके अंदर उत्तेजना, अस्थिरता और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है। प्रोफेसर शेखावत के अनुसार, तीन साल तक के छोटे बच्चे भी स्मार्टफोन पर रील्स देखते दिखाई देते हैं, जो उनके बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत हानिकारक है।
सोशल मीडिया बच्चों को उनकी पसंद का कंटेंट लगातार दिखाता रहता है, जिसके कारण बच्चे उसी तरह की चीज़ें बार-बार देखने के आदी हो जाते हैं। जब उन्हें कोई काम पसंद नहीं आता, तो वे उसे करने से साफ इनकार कर देते हैं। रोमांचक वीडियो देखने की लत उन्हें ऐसे व्यवहार की ओर ले जाती है, जहां वे लगातार नए मनोरंजन की तलाश करते रहते हैं और यह आदत आगे चलकर नशे जैसी निर्भरता में बदल सकती है। कई बच्चे स्मार्टफोन, गेमिंग और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से चिपके रहते हैं, जिससे उनकी भावनात्मक नियंत्रण की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चे तनाव या परेशानी में होने पर दूसरों से बात करने की बजाय सोशल मीडिया पर शरण लेते हैं।
सोशल मीडिया पर साइबर बुलिंग भी बच्चों के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। जहां पहले स्कूलों में या मोहल्ले में होने वाली बुलिंग कुछ सीमित समय तक रहती थी, वहीं अब सोशल मीडिया इसे 24 घंटे का दबाव बना देता है। रात में अचानक किसी नकारात्मक टिप्पणी या पोस्ट की सूचना मिलने से बच्चे भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं, जिसके कारण उनकी नींद प्रभावित होती है और मानसिक तनाव बढ़ता है।
किशोरावस्था में बच्चे सोशल मीडिया पर आवेगी रिश्ते भी बना लेते हैं, जो आगे चलकर गंभीर समस्याओं का कारण बनते हैं। बिना सोचे-समझे बनाए गए रिश्ते जल्दी टूट जाते हैं, जिससे बच्चे भावनात्मक रूप से आहत होते हैं। कई मामलों में ऐसे रिश्ते गलत दिशा में भी चले जाते हैं और नाबालिगों के बीच यौन संबंधों के मामलों में वृद्धि होती है, जिससे POCSO जैसे गंभीर कानूनी मुद्दे उत्पन्न होते हैं।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों को दिन में एक घंटे से अधिक सोशल मीडिया का उपयोग नहीं करना चाहिए। एक अध्ययन के अनुसार, 9 साल के बच्चे औसतन 30 मिनट सोशल मीडिया पर बिताते हैं, जबकि 13 साल तक यह समय बढ़कर 2.5 घंटे पहुँच जाता है, जो अत्यंत चिंताजनक है। लगातार स्क्रीन देखने से मेलाटोनिन का स्राव बाधित होता है, जिससे बच्चों की नींद बिगड़ती है और उनका समग्र मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। यदि उपयोग इसी गति से बढ़ता रहा, तो अगले पांच वर्षों में हर तीसरा बच्चा किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना कर सकता है।





