Pediatric Kidney Transplant: सफदरजंग अस्पताल बना पहला केंद्रीय अस्पताल, सफल पीडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट से 11 वर्षीय बच्चे की जान बचाई

Pediatric Kidney Transplant: सफदरजंग अस्पताल बना पहला केंद्रीय अस्पताल, सफल पीडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट से 11 वर्षीय बच्चे की जान बचाई

नई दिल्ली, 25 नवम्बर 2025: सफदरजंग अस्पताल ने चिकित्सा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। अस्पताल ने पहली बार केंद्रीय स्तर पर पीडियाट्रिक रीनल ट्रांसप्लांट किया, जिसमें 11 वर्षीय बच्चे का जीवन बचाया गया। इस दुर्लभ और जटिल सर्जरी में यूरोलॉजी और रीनल ट्रांसप्लांट के हेड डॉ. पवन वासुदेवा और पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी की इंचार्ज डॉ. शोभा शर्मा ने मुख्य भूमिका निभाई।

मरीज एक 11 वर्षीय लड़का था जिसे ‘बाइलेटरल हाइपोडिस्प्लास्टिक किडनी’ नामक दुर्लभ जन्मजात बीमारी थी। इस कारण वह किडनी रोग की अंतिम स्टेज यानी सीकेडी-5 में पहुंच गया था, जिसमें गुर्दे शरीर के अपशिष्ट और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। इस स्थिति में बच्चे के लिए डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट ही जीवनरक्षक विकल्प था।

डॉ. शोभा शर्मा ने बताया कि बच्चे को लगभग डेढ़ साल पहले गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था, जहां उसे कार्डियक अरेस्ट के बाद बचाया गया। तब से बच्चा पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी विभाग के अंतर्गत नियमित डायलिसिस पर था। यह जन्मजात किडनी की स्थिति देश की लगभग 5-10 प्रतिशत बाल आबादी में पाई जाती है और 10-12 साल की उम्र तक जटिल हो जाती है, जिसका एकमात्र समाधान किडनी ट्रांसप्लांट होता है।

सर्जरी के लिए बच्चे की 35 वर्षीय मां ने स्वयं किडनी दान की। डॉ. पवन वासुदेवा के अनुसार, पीडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट वयस्कों की तुलना में जटिल होती है क्योंकि बड़े किडनी के बड़े रक्त वाहिकाओं को बच्चे की छोटी नसों से जोड़ना और शरीर में जगह बनाना चुनौतीपूर्ण होता है। सर्जरी सफल रही और ट्रांसप्लांट की गई किडनी अब पूरी तरह से काम कर रही है। बच्चे की रिकवरी सकारात्मक है और उसे जल्द ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।

सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा निदेशक डॉ. संदीप बंसल ने बताया कि बच्चे के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और परिवार उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में रहता है। निजी क्षेत्र में ट्रांसप्लांट के लिए 15 लाख रुपये का खर्च बताया गया था, जिसे देखते हुए परिवार ने उम्मीद छोड़ दी थी। अस्पताल ने यह ट्रांसप्लांट मुफ्त किया और अब बच्चे को इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं भी निशुल्क उपलब्ध कराई जाएंगी, जो लंबे समय तक आवश्यक होती हैं।

यह उपलब्धि न केवल पीडियाट्रिक ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है बल्कि कम संसाधनों वाले परिवारों के लिए जीवन रक्षक चिकित्सा सेवाओं की भी मिसाल पेश करती है।

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