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New Delhi : संसद में बोलने की स्वतंत्रता नियमों के अधीन, अव्यवस्था से सदन की गरिमा घटती है- लोकसभा अध्यक्ष

New Delhi : लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि संसद में बोलने की आजादी है, लेकिन यह संविधान और संसदीय नियमों के दायरे में ही संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सदन के किसी भी सदस्य को नियमों से परे जाकर बोलने का विशेषाधिकार नहीं है और सभी सदस्यों पर नियम समान रूप से लागू होते हैं।

अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा समाप्त होने के एक दिन बाद सदन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों में 12 घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई, जिसमें विभिन्न दलों के सदस्यों ने अपने विचार, तर्क और चिंताएं रखीं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की यही विशेषता है कि हर आवाज सुनी जाती है और हर दृष्टिकोण को महत्व दिया जाता है।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 105 का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद में वाक्-स्वतंत्रता भी संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के ढांचे के भीतर ही लागू होती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रतिपक्ष के नेता सहित कोई भी सदस्य कभी भी उठकर अपनी इच्छा से किसी भी विषय पर बोलने का अधिकार नहीं रखता, क्योंकि सदन की कार्यवाही निर्धारित नियमों से संचालित होती है।

माइक्रोफोन बंद किए जाने के आरोपों पर उन्होंने कहा कि पीठासीन अधिकारी के पास माइक्रोफोन ऑन या ऑफ करने का कोई बटन नहीं होता। सदन में व्यवस्था ऐसी है कि जिस सदस्य को बोलने की अनुमति दी जाती है, उसी का माइक्रोफोन चालू रहता है।

उन्होंने कहा कि सदन का आसन किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं, संविधान की भावना और संसद की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि उनका प्रयास हमेशा नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार निष्पक्षता, अनुशासन और संतुलन के साथ सदन की कार्यवाही संचालित करने का रहा है।

महिला सांसदों के सम्मान से जुड़ी चिंताओं पर उन्होंने कहा कि उनके मन में सभी महिला सदस्यों के प्रति सर्वोच्च सम्मान है और हर महिला सदस्य को सदन में बोलने का अवसर दिलाने के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में पहली बार चुनी गई महिला सांसदों सहित सभी को अपने विचार रखने का अवसर मिला है।

विपक्ष को पर्याप्त समय न मिलने के आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि लोकसभा की हाल की कार्यवाही के आंकड़ों के अनुसार प्रमुख विषयों पर बहस के दौरान संख्या बल के आधार पर विपक्षी सदस्यों को अधिक समय मिला है। साथ ही छोटे दलों, एक सदस्य वाले दलों और निर्दलीय सांसदों को भी भागीदारी का अवसर देने का प्रयास किया गया है। उन्होंने बताया कि कई बार अधिक सदस्यों को बोलने का अवसर देने के लिए बहस और शून्यकाल का समय भी बढ़ाया जाता है।

सदन में व्यवधान, नारेबाजी, तख्तियां दिखाने और कागज फाड़ने जैसी घटनाओं की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थापित संसदीय परंपराओं के विपरीत है और इससे संसद की गरिमा और प्रतिष्ठा कम होती है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और तीखी बहस स्वाभाविक है, लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श और अव्यवस्था के बीच स्पष्ट रेखा होती है।

उन्होंने कहा कि संसद 140 करोड़ नागरिकों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है और प्रत्येक सदस्य अपने क्षेत्र के लाखों लोगों की आकांक्षाओं के साथ सदन में आता है। इसलिए संसद की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सभी दलों के सदस्यों से संसद को मजबूत करने और जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की अपील की और कहा कि राष्ट्र सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से आगे बढ़ना आवश्यक है।

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