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ICMR Mental Health: आत्महत्या रोकथाम और इलाज तक पहुंच बढ़ाने पर हो प्राथमिक फोकस, मानसिक स्वास्थ्य शोध की दिशा तय: ICMR

ICMR Mental Health: आत्महत्या रोकथाम और इलाज तक पहुंच बढ़ाने पर हो प्राथमिक फोकस, मानसिक स्वास्थ्य शोध की दिशा तय: ICMR

नई दिल्ली, 4 जनवरी। देश में तेजी से बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों को देखते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने आत्महत्या रोकथाम और मानसिक रोगों के इलाज में मौजूद बड़े ‘ट्रीटमेंट गैप’ को कम करने पर विशेष फोकस करने की जरूरत बताई है। इसके लिए आईसीएमआर ने एक मॉडिफाइड डेल्फी-आधारित अभ्यास के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य शोध की प्राथमिकताएं तय की हैं। इस पहल का उद्देश्य सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य अनुसंधान में मौजूद प्रमुख कमियों की पहचान कर एक स्पष्ट और व्यावहारिक रोडमैप तैयार करना है।

आईसीएमआर द्वारा किए गए इस अभ्यास में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, राज्य स्तर के कार्यक्रम अधिकारियों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख हितधारकों को शामिल किया गया। लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा था कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य शोध को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट प्राथमिकताओं और साझा सहमति का अभाव है। ऐसे में यह अभ्यास नीति निर्माण और अनुसंधान की दिशा तय करने की ओर एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

अध्ययन के दौरान आम सहमति प्रक्रिया के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े शोध प्रश्नों को क्रमबद्ध किया गया और तीन प्रमुख शोध प्राथमिकताओं की पहचान की गई। इनमें स्कूलों और कॉलेजों में आत्महत्या रोकथाम के प्रभावी हस्तक्षेपों को लागू करना, गैर-संक्रामक रोगों की देखभाल व्यवस्था में मानसिक विकारों की नियमित स्क्रीनिंग और उपचार को एकीकृत करना तथा मानसिक रोगों के इलाज में मौजूद भारी अंतर यानी ट्रीटमेंट गैप को कम करना शामिल है। आईसीएमआर का मानना है कि इन क्षेत्रों पर केंद्रित शोध आने वाले वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य नीतियों को अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाएगा।

मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के आपसी संबंध पर जोर देते हुए इहबास दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि मानसिक विकार सीधे तौर पर व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, एंग्जायटी और थायराइड जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों के जोखिम को बढ़ाती हैं। इसलिए शारीरिक रोगों के इलाज के दौरान मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि मन और तन की सेहत एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

डॉ. ओमप्रकाश ने देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर स्थिति की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि लगभग 140 करोड़ की आबादी वाले भारत में सिर्फ करीब 10 हजार मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, यानी एक लाख लोगों पर एक मनोचिकित्सक भी उपलब्ध नहीं है। यह आंकड़ा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद भारी कमी को दर्शाता है।

उन्होंने आगे बताया कि विशेषज्ञों ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार के लिए तीन बुनियादी प्राथमिकताएं तय की हैं। पहली, स्कूलों और कॉलेजों में आत्महत्या रोकथाम के लिए प्रभावी कार्यक्रम लागू करना, क्योंकि हर साल लगभग 30 हजार छात्रों की आत्महत्या से मौत हो जाती है। दूसरी, मधुमेह और हृदय रोग जैसे गैर-संक्रामक रोगों के क्लीनिकों में नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच को अनिवार्य बनाना, जिससे करीब 20 करोड़ मरीजों को लाभ मिल सकता है। तीसरी और सबसे बड़ी चुनौती लगभग 15 करोड़ भारतीयों को प्रभावित करने वाले मानसिक विकारों के इलाज में मौजूद 80 से 90 प्रतिशत के ट्रीटमेंट गैप को कम करना है, जहां 100 में से करीब 90 मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।

आईसीएमआर के अनुसार इस अभ्यास से प्राप्त निष्कर्ष आने वाले समय में मानसिक स्वास्थ्य नीति निर्माण, शोध प्राथमिकताओं के निर्धारण और संसाधनों के प्रभावी आवंटन में अहम भूमिका निभाएंगे, जिससे देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और मजबूत बनाया जा सकेगा।

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