Junk Food: बच्चों की सेहत पर बढ़ता खतरा, कर्नाटक की सख्ती और एम्स की स्टडी ने बढ़ाई चिंता

Junk Food: बच्चों की सेहत पर बढ़ता खतरा, कर्नाटक की सख्ती और एम्स की स्टडी ने बढ़ाई चिंता
बच्चों में बढ़ते मोटापे, टाइप-2 डायबिटीज और अन्य गैर-संचारी बीमारियों को लेकर देश और दुनिया में चिंता लगातार गहराती जा रही है। पिज्जा, बर्गर, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक और अन्य हाई फैट, हाई शुगर और हाई सॉल्ट (एचएफएसएस) वाले खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत को देखते हुए अब सरकारें भी सख्त कदम उठाने लगी हैं। भारत में कर्नाटक सरकार ने स्कूलों और अस्पतालों के अंदर तथा आसपास जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। वहीं, ब्रिटेन में भी स्कूलों के पास नए फास्ट फूड आउटलेट खोलने पर रोक, जंक फूड के विज्ञापनों पर नियंत्रण और पोषण संबंधी लेबलिंग को अनिवार्य बनाने जैसी सिफारिशें सामने आई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की बदलती खानपान की आदतें आने वाले वर्षों में गंभीर स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती हैं। इसी बीच अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन ने भारत में जंक फूड से जुड़े नियमों के पालन की स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
एम्स के शोधकर्ताओं डॉ. रीमा दादा, डॉ. राजा सिंह और डॉ. ऑर्थर एल. फ्रैंक द्वारा किए गए अध्ययन में दिल्ली के 49 सरकारी और निजी स्कूलों का मूल्यांकन किया गया। इस अध्ययन का उद्देश्य यह जानना था कि स्कूल परिसरों में जंक फूड पर रोक और स्वस्थ भोजन को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए दिशा-निर्देशों का कितना प्रभावी तरीके से पालन किया जा रहा है।
अध्ययन में सामने आया कि कई स्कूलों में स्वस्थ खानपान से संबंधित नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया जा रहा है। अनेक स्कूल परिसरों में स्वस्थ भोजन को बढ़ावा देने वाले सूचना बोर्ड नहीं मिले। इसके अलावा छात्रों और अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी सीमित पाए गए। कुछ स्कूलों ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई, जिससे नियमों के अनुपालन को लेकर और सवाल खड़े हुए।
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हाई फैट, हाई शुगर और हाई सॉल्ट वाले खाद्य पदार्थ बच्चों में मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और अन्य गैर-संचारी बीमारियों के खतरे को तेजी से बढ़ा रहे हैं। यदि शुरुआती उम्र में खानपान की आदतों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में स्वास्थ्य व्यवस्था पर इसका बड़ा बोझ पड़ सकता है।
इसी बीच कर्नाटक सरकार ने स्कूलों और अस्पतालों के आसपास जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाने की दिशा में पहल शुरू की है। सरकार का उद्देश्य बच्चों और मरीजों को अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता से दूर रखना है, ताकि स्वस्थ खानपान की आदतों को बढ़ावा दिया जा सके।
वहीं, ब्रिटेन में भी बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की गई हैं। इनमें स्कूलों के पास नए फास्ट फूड आउटलेट खोलने पर रोक, जंक फूड के विज्ञापनों को सीमित करना और खाद्य उत्पादों पर स्पष्ट पोषण संबंधी जानकारी देना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी नीतियां बच्चों को अस्वास्थ्यकर भोजन से दूर रखने में मदद कर सकती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन बेहद जरूरी है। नियमित निगरानी, सख्त कार्रवाई और स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रमों के बिना बच्चों को जंक फूड के बढ़ते खतरे से बचाना आसान नहीं होगा।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केवल सरकारी नियम पर्याप्त नहीं हैं। अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को भी बच्चों में संतुलित और पौष्टिक भोजन की आदत विकसित करने के लिए मिलकर प्रयास करने होंगे। कर्नाटक और ब्रिटेन की पहल ने एक बार फिर इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है और यह संकेत दिया है कि बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए मजबूत नीति के साथ उसका सख्ती से पालन भी उतना ही आवश्यक है।





