Javelin Missile Deal: भारत-अमेरिका ने जेवलिन मिसाइल सौदे पर लगाई मुहर, 100 से ज्यादा एंटी-टैंक मिसाइलों की आपात खरीद को मंजूरी
नई दिल्ली। करीब 16 वर्षों से लंबित जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सौदा अब निर्णायक मुकाम पर पहुंच गया है। भारत और अमेरिका ने भारतीय सेना के लिए 100 से अधिक जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइलों की खरीद को आगे बढ़ाने पर मुहर लगा दी है। करीब 45 मिलियन डॉलर से अधिक के इस सौदे का उद्देश्य सेना की तत्काल परिचालन जरूरतों को पूरा करने के साथ उसकी एंटी-टैंक मारक क्षमता को मजबूत करना है। इसके समानांतर भारत में जेवलिन मिसाइल के संयुक्त उत्पादन की दिशा में भी प्रयास तेज किए जा रहे हैं।
अमेरिकी दूतावास के अनुसार, भारतीय सेना ने खरीद प्रक्रिया के लिए लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (एलओए) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। मौजूदा खरीद को सेना की तत्काल जरूरतों के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। वहीं, लंबी अवधि की रणनीति के तहत भारत में बड़े स्तर पर जेवलिन मिसाइल के संयुक्त उत्पादन को लेकर दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी है।
भारत ने इस खरीद के तहत 100 एफजीएम-148 जेवलिन मिसाइलों के साथ एक अतिरिक्त परीक्षण मिसाइल की मांग की है। इसके अलावा 25 हल्के कमांड लॉन्च यूनिट भी पैकेज का हिस्सा हैं। इन लॉन्च यूनिट की मदद से सैनिक युद्धक्षेत्र में मिसाइल प्रणाली को संचालित कर सकेंगे।
सौदे में केवल मिसाइल और लॉन्चिंग सिस्टम ही शामिल नहीं हैं। इसके साथ प्रशिक्षण उपकरण, सिमुलेशन राउंड, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी दस्तावेज और लाइफ-साइकिल सपोर्ट जैसी सुविधाओं को भी शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य मिसाइल प्रणाली को सेना में शामिल करने के बाद उसके संचालन, प्रशिक्षण और रखरखाव के लिए आवश्यक समर्थन सुनिश्चित करना है।
जेवलिन एक पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणाली है, जिसे मुख्य रूप से बख्तरबंद वाहनों और टैंकों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए विकसित किया गया है। भारतीय सेना में इसकी तैनाती से अग्रिम मोर्चों पर सैनिकों की एंटी-टैंक क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में मदद मिलने की उम्मीद है।
इस सौदे का दीर्घकालिक महत्व भारत में जेवलिन के संभावित सह-उत्पादन से भी जुड़ा है। फरवरी 2025 में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) ने जेवलिन ज्वाइंट वेंचर से जुड़ी रेथियॉन और लॉकहीड मार्टिन के साथ भारत में मिसाइल निर्माण की संभावनाएं तलाशने के लिए समझौता किया था।
इसके बाद जुलाई 2025 में भारत की ओर से अमेरिका के समक्ष जेवलिन मिसाइल के सह-उत्पादन का प्रस्ताव रखा गया। इसके बाद से दोनों पक्ष भारत में मिसाइल प्रणाली के निर्माण की संभावनाओं पर आगे बढ़ रहे हैं। यदि सह-उत्पादन की योजना अंतिम रूप लेती है तो यह भारतीय रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
जेवलिन को लेकर भारत की कवायद करीब 16 साल पुरानी है। भारत ने पहली बार अगस्त 2010 में इस एंटी-टैंक मिसाइल प्रणाली को खरीदने की योजना सार्वजनिक की थी। हालांकि तकनीक हस्तांतरण और परीक्षण समेत विभिन्न मुद्दों पर मतभेदों के कारण सौदा लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सका।
अब तत्काल जरूरत के लिए मिसाइलों की खरीद और भारत में संयुक्त उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ती बातचीत ने इस पुरानी योजना को फिर से गति दी है। मौजूदा खरीद से जहां भारतीय सेना को अपेक्षाकृत जल्द अतिरिक्त एंटी-टैंक क्षमता मिलने का रास्ता साफ होगा, वहीं घरेलू निर्माण की योजना भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में अहम साबित हो सकती है।
भारत लगातार विदेशी रक्षा प्रणालियों की खरीद के साथ देश में उनके निर्माण, तकनीकी सहयोग और स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर दे रहा है। ऐसे में जेवलिन मिसाइल का संभावित सह-उत्पादन भारतीय सेना की परिचालन क्षमता मजबूत करने के साथ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


