H1N1 Alert: दिल्ली पर फ्लू-डेंगू का डबल वार, स्वाइन फ्लू के 1,449 मरीज; एक साल में छह गुना से ज्यादा उछाल
नई दिल्ली, 21 अगस्त। मानसून के बीच दिल्ली में मौसमी बीमारियों का दबाव बढ़ गया है। एक तरफ एच1एन1 यानी स्वाइन फ्लू के मामलों में तेज उछाल दर्ज किया गया है, वहीं दूसरी ओर डेंगू के मामले भी स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा रहे हैं। बदलते मौसम के बीच एक साथ श्वसन और मच्छरजनित बीमारियों के बढ़ने से लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) के आंकड़ों के मुताबिक, 12 अगस्त तक दिल्ली में एच1एन1 के 1,449 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या केवल 229 थी। इस लिहाज से एक साल के भीतर मामलों में छह गुना से अधिक बढ़ोतरी हुई है। अकेले 11 अगस्त को राजधानी में एच1एन1 के 63 नए मामले सामने आए।
एच1एन1 के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने शुक्रवार को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ स्थिति की समीक्षा की। बैठक में संक्रमण की निगरानी के साथ अस्पतालों की तैयारियों पर विशेष चर्चा की गई।
स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा के दौरान आईएलआई यानी इन्फ्लुएंजा लाइक इलनेस और एसएआरआई यानी सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन सर्विलांस, जांच व्यवस्था और प्रयोगशालाओं की निगरानी का जायजा लिया गया। इसके अलावा अस्पतालों में बेड, आईसीयू और जरूरी दवाओं की उपलब्धता सहित गंभीर मरीजों के इलाज की तैयारियों की भी समीक्षा की गई।

विशेषज्ञों के मुताबिक मानसून के दौरान बढ़ी हुई नमी और तापमान में लगातार बदलाव मौसमी श्वसन संक्रमण को बढ़ावा दे सकते हैं। सफदरजंग अस्पताल के पल्मोनरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. नीरज गुप्ता के अनुसार इस मौसम में सामान्य वायरल संक्रमण, इन्फ्लुएंजा और दूसरी श्वसन संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ना आम है।
एच1एन1 संक्रमण में अचानक तेज बुखार, ठंड लगना, सूखी खांसी, गले में खराश, नाक बहना, सिरदर्द, थकान और बदन दर्द जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। बच्चों में इसके साथ उल्टी और दस्त की शिकायत भी सामने आ सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों और पहले से गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। डायबिटीज, हृदय रोग या फेफड़ों की बीमारी वाले मरीजों में संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है, इसलिए लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।
एम्स दिल्ली के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. नवल विक्रम के मुताबिक एच1एन1 की पुष्टि होने या चिकित्सकीय रूप से संक्रमण की आशंका होने पर डॉक्टर मरीज की स्थिति के आधार पर ओसेल्टामिविर यानी टैमी फ्लू दवा शुरू करने का निर्णय ले सकते हैं। लक्षण शुरू होने के शुरुआती 48 घंटे के भीतर उपचार शुरू करना सबसे अधिक प्रभावी माना जाता है। इससे बीमारी को नियंत्रित करने और इसके गंभीर होने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि 48 घंटे बीतने के बाद उपचार का लाभ नहीं मिलता। गंभीर रूप से बीमार, तेजी से बिगड़ रहे या अस्पताल में भर्ती मरीजों में डॉक्टर की सलाह पर बाद में भी एंटीवायरल उपचार शुरू किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने लोगों को एंटीबायोटिक के अनावश्यक इस्तेमाल से भी बचने की सलाह दी है। सामान्य वायरल फ्लू में एंटीबायोटिक दवाएं प्रभावी नहीं होतीं, क्योंकि वे वायरस पर काम नहीं करतीं। यदि मरीज को बैक्टीरियल संक्रमण या निमोनिया जैसी जटिलता हो जाती है, तभी डॉक्टर जांच और मरीज की स्थिति के आधार पर एंटीबायोटिक देने का फैसला कर सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कुछ गंभीर चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज नहीं करने की सलाह दी है। सांस लेने में परेशानी या सांस फूलना, सीने में दर्द, शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरना, अत्यधिक कमजोरी, भ्रम की स्थिति, लगातार तेज बुखार या मरीज की हालत तेजी से बिगड़ना गंभीर संक्रमण के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को बिना देरी अस्पताल ले जाना चाहिए।
संक्रमण से बचाव के लिए भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनने, नियमित रूप से हाथ साफ करने और खांसते या छींकते समय मुंह तथा नाक को ढकने की सलाह दी गई है। फ्लू जैसे लक्षण होने पर दूसरे लोगों से दूरी बनाए रखना भी संक्रमण के प्रसार को कम करने में मदद कर सकता है।
विशेषज्ञों ने लोगों को ओसेल्टामिविर या किसी दूसरी एंटीवायरल दवा का खुद से इस्तेमाल नहीं करने की चेतावनी दी है। ऐसी दवाएं मरीज की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और बीमारी की गंभीरता को ध्यान में रखकर डॉक्टर की सलाह पर ही ली जानी चाहिए।
दिल्ली में एच1एन1 के मामलों में तेज बढ़ोतरी के साथ डेंगू का खतरा भी बना हुआ है। ऐसे में स्वास्थ्य एजेंसियों के सामने एक तरफ श्वसन संक्रमण की रोकथाम और उपचार की चुनौती है तो दूसरी तरफ मच्छरजनित बीमारियों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी भी है। आने वाले दिनों में मौसम और संक्रमण की स्थिति को देखते हुए निगरानी और अस्पतालों की तैयारियां महत्वपूर्ण रहेंगी।


