Day Care Centres: कामकाजी महिलाओं के लिए डे-केयर बना सहारा, बच्चों की देखभाल पर हर महीने खर्च हो रहे 7 से 15 हजार रुपये
नोएडा। बच्चे के जन्म के बाद कई कामकाजी महिलाओं के सामने नौकरी और बच्चे की देखभाल के बीच संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हो जाती है। संयुक्त परिवार का साथ नहीं होने या घर में दादा-दादी और अन्य सदस्यों के उपलब्ध नहीं रहने की स्थिति में डे-केयर सेंटर कामकाजी माताओं के लिए महत्वपूर्ण सहारा बन रहे हैं। महिलाएं अपने बच्चों को डे-केयर सेंटर में छोड़कर नौकरी पर जा रही हैं, हालांकि इस सुविधा के लिए उन्हें हर महीने हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
नोएडा के अलग-अलग क्षेत्रों में संचालित डे-केयर सेंटरों की मासिक फीस करीब सात हजार रुपये से शुरू होकर 15 हजार रुपये तक पहुंच रही है। फीस बच्चे की उम्र, डे-केयर में बिताए जाने वाले समय और उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
कामकाजी महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चिंता नौकरी के दौरान बच्चे की सुरक्षित देखभाल की होती है। खासतौर पर छोटे बच्चों को लंबे समय तक अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसे में परिवार का सहयोग नहीं मिलने पर डे-केयर एक विकल्प के रूप में सामने आता है।
तीन कामकाजी माताओं से बातचीत में सामने आया कि डे-केयर की फीस अधिक होने के बावजूद यह सुविधा उन्हें अपना कॅरिअर जारी रखने में मदद कर रही है। बच्चे के लिए सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध होने से वे नौकरी पर ध्यान दे पा रही हैं।
कई महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश समाप्त होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती बच्चे को संभालने की व्यवस्था करना होती है। घर में कोई सदस्य उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में नौकरी छोड़ना या डे-केयर जैसी सुविधा का सहारा लेना प्रमुख विकल्प रह जाते हैं।
ऐसे में शहर में डे-केयर सेंटरों की उपयोगिता बढ़ रही है। यहां बच्चों की देखभाल के साथ उनकी दिनचर्या, भोजन, आराम और गतिविधियों का भी ध्यान रखने की व्यवस्था की जाती है।
हालांकि अभिभावकों के लिए केवल फीस देखकर डे-केयर का चुनाव करना पर्याप्त नहीं है। बच्चों की सुरक्षा और स्वच्छता से संबंधित व्यवस्थाओं की पूरी जांच करना बेहद जरूरी है।
महिला सुरक्षा डीसीपी सुनीति के अनुसार बच्चों को डे-केयर में भेजने से पहले वहां सुरक्षा और स्वच्छता के मानकों की गहन जांच करनी चाहिए।
अभिभावकों को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संबंधित संस्थान के पास आवश्यक वैध सरकारी लाइसेंस और अनुमतियां हैं या नहीं। संस्थान के संचालन से जुड़े दस्तावेजों के बारे में भी जानकारी लेना जरूरी है।
डे-केयर में काम करने वाले कर्मचारियों के बारे में जानकारी जुटाना भी बच्चों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। इनमें शिक्षक, आया, गार्ड और बच्चों के सीधे संपर्क में आने वाले अन्य कर्मचारी शामिल हैं।
डीसीपी सुनीति ने कहा कि कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन होना चाहिए। इससे संस्थान में काम करने वाले लोगों की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी रहती है और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलती है।
अभिभावकों को डे-केयर में साफ-सफाई की स्थिति भी देखनी चाहिए। छोटे बच्चों के लिए स्वच्छ वातावरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, इसलिए खेलने, सोने, खाने और शौचालय से संबंधित स्थानों की सफाई पर ध्यान देना जरूरी है।
बच्चों को डे-केयर में छोड़ने से पहले अभिभावकों को वहां की सुरक्षा व्यवस्था, प्रवेश और निकास की प्रक्रिया तथा बच्चे को किस व्यक्ति के सुपुर्द किया जाता है, इसकी जानकारी भी लेनी चाहिए।
इसके साथ ही आपात स्थिति में संस्थान की कार्यप्रणाली और अभिभावकों से संपर्क करने की व्यवस्था के बारे में पहले से जानकारी लेना उपयोगी हो सकता है।
कामकाजी माताओं के लिए डे-केयर सेंटर जहां नौकरी जारी रखने में मददगार साबित हो रहे हैं, वहीं हर महीने सात से 15 हजार रुपये तक का खर्च परिवार के बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है।
इसके बावजूद जिन परिवारों में बच्चे की नियमित देखभाल के लिए कोई सदस्य उपलब्ध नहीं है, उनके लिए डे-केयर एक महत्वपूर्ण विकल्प बन गया है। विशेषज्ञों का जोर है कि इस सुविधा का चुनाव करते समय कीमत के साथ बच्चे की सुरक्षा, कर्मचारियों के सत्यापन और स्वच्छता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


