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डायबिटीज की राजधानी भारत में 100 में से सिर्फ 10 लोगों का शुगर नियंत्रण में 

-देश में तेजी से बढ़ रहे मरीजों की संख्या नियंत्रित करने के लिए सटीक स्वास्थ्य सर्वेक्षण जरुरी : डॉ निखिल टंडन

नई दिल्ली, 28 मई : भारत में डायबिटीज या मधुमेह पीड़ितों की संख्या में लगातार इजाफा होने के चलते मरीजों का आंकड़ा 100 मिलियन के पार हो गया है जो आने वाले दशकों में और ज्यादा बढ़ सकता है। लेकिन डायबिटीज के संकेतकों या बायो मार्कर की सटीक वैज्ञानिक पहचान इस बीमारी के प्रसार में कमी ला सकती है। यह जानकारी अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य जर्नल द लैंसेट : डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी में प्रकाशित भारतीय सर्वेक्षण पद्धतियों और अनुमानों के विश्लेषण से सामने आई है।

इस शोध को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ निखिल टंडन और एमोरी ग्लोबल डायबिटीज रिसर्च सेंटर, अटलांटा, यूएसए के डॉ. जितिन सैम वर्गीस के नेतृत्व में संपन्न किया गया है, जिसके मुताबिक डायबिटीज देखभाल के लिए प्रमुख संकेतक बनाए जाने बहुत जरुरी हैं। साथ ही एक संकेतक की एक से अधिक परिभाषाओं की जगह एक सर्वमान्य और वैज्ञानिक परिभाषा का होना भी जरूरी है। इन परिभाषाओं के अभाव में स्वास्थ्य के क्षेत्र में संपन्न पांच भारतीय सर्वेक्षणों के परिणाम अलग -अलग पाए गए हैं।

डॉ निखिल टंडन ने कहा स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के परिणाम सुसंगत बनाने के लिए संकेतकों की परिभाषाओं में एकरूपता लाई जानी जरूरी है, जिससे सर्वेक्षण के परिणामों के आधार पर डायबिटीज नियंत्रण के बाबत राष्ट्रव्यापी योजना तैयार की जा सकेगी। उन्होंने कहा, हमारा लक्ष्य देश के 80 फीसदी डायबिटीज पीड़ितों तक स्क्रीनिंग, डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट की सुविधा को पहुंचाना है। हालांकि, यह भारत के लिए एक चुनौती है।लेकिन, चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पता लगाना और सही प्रबंधन मरीजों को सामान्य जीवन जीने में मदद करने में काफी मददगार हो सकता है।

डॉ टंडन ने कहा आज देश के 50% लोगों को ये ही नहीं पता कि उन्हें डायबिटीज है या नहीं और जिन्हें पता चल जाता है, उनमें से भी कुछ ही लोग नियमित इलाज कराते हैं। अगर डायबिटीज नियंत्रण की बात करें तो 100 में से सिर्फ 10 ही पीड़ित ऐसे हैं जिनकी डायबिटीज नियंत्रण में हैं। उन्होंने कहा सामान्य बीमारी में दवा लेने के बाद व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है और उसे दवा लेने की जरुरत नहीं पड़ती, लेकिन डायबिटीज होने पर व्यक्ति को जीवनभर दवा लेनी पड़ती है। इसलिए सरकार ने डायबिटीज रोग की पहचान, रोकथाम और प्रबंधन में सुधार लाने के बाबत गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपी-एनसीडी) शुरू किया है।

सर्वेक्षण को लेकर सरकार से अपेक्षा
भविष्य में होने वाले भारत के स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में एक संकेतक की एक परिभाषा, सभी जीवनशैली रोगों का विवरण और विश्लेषण का दृष्टिकोण शामिल होना चाहिए ताकि सर्वे रिपोर्ट के आधार पर देशवासियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के काम में तेजी लाई जा सके। साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक साल 2030 तक देश को डायबिटीज मुक्त बनाने का लक्ष्य हासिल किया जा सके।

डायबिटीज से होने वाली बीमारी
डायबिटीज से आंखों, गुर्दे, तंत्रिकाओं और हृदय को नुकसान होने का खतरा बढ़ जाता है। वजन कम हो सकता है, त्वचा या योनि में यीस्ट संक्रमण हो सकता है, और कटने या घावों को ठीक करने में परेशानी हो सकती है। डायबिटीज कुछ प्रकार के कैंसर से भी जुड़ा हुआ है। डायबिटीज को रोकने के लिए कदम उठाने से स्वास्थ्य समस्याओं के विकसित होने का जोखिम कम हो सकता है। यह एक जीवनशैली रोग है जिसके पीछे आहार पैटर्न में बदलाव, शारीरिक निष्क्रियता, वजन में वृद्धि और विशेष रूप से पेट के आस-पास चर्बी का जमा होना प्राथमिक कारण हैं।

डायबिटीज के बायोमार्कर में अंतर
बायोमार्कर और प्रमुख संकेतकों की परिभाषाओं में अंतर के कारण तमाम सर्वेक्षणों के अनुमानों में भी अंतर पाया जा रहा है। इन परिभाषाओं में एकरूपता लाई जाए तो सर्वेक्षण के निष्कर्षों को सुसंगत बनाने के साथ मधुमेह की स्क्रीनिंग और प्रबंधन करने तक के प्रयासों में मदद मिल सकती है।

डायबिटीज क्या है?
डायबिटीज एक चिकित्सा स्थिति है जो टाइप-1 मधुमेह के मामले में अग्न्याशय से इंसुलिन के अपर्याप्त उत्पादन और स्राव के कारण होती है और टाइप-2 मधुमेह के लिए इंसुलिन की दोषपूर्ण प्रतिक्रिया होती है। सामान्य शारीरिक परिस्थितियों में, रक्त शर्करा के स्तर को इंसुलिन द्वारा कड़ाई से नियंत्रित किया जाता है, जो अग्न्याशय द्वारा उत्पादित एक हार्मोन है। इंसुलिन रक्त शर्करा के स्तर को कम करता है।

जब रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है (उदाहरण के लिए, भोजन करने के बाद), तो ग्लूकोज के स्तर को सामान्य करने के लिए अग्न्याशय से इंसुलिन निकलता है। मधुमेह के रोगियों में, इंसुलिन का अभाव या अपर्याप्त उत्पादन हाइपरग्लाइसेमिया का कारण बनता है। भारत में व्यापकता मधुमेह मुख्य रूप से एक जीवनशैली की स्थिति है जो भारत में सभी आयु समूहों में चिंताजनक रूप से बढ़ी है, और युवा आबादी में भी इसका प्रचलन 10% से अधिक बढ़ गया है।

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