Chennai : बच्चे को कम अंक पर डांटें नहीं, मेहनत के लिए प्रोत्साहित करें, अभिनेता डॉ. धामू ने साझा किए शिक्षा पर विचार

Chennai : तमिल सिनेमा के अभिनेता और हास्य कलाकार ए वी धामोदरन उर्फ डॉ. धामू ने शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के अंकों को लेकर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा को सिर्फ परीक्षा के अंकों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। शिक्षा का असली मकसद शिक्षक और छात्र के बीच जुड़ाव बनाना और बच्चे को उसकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना होना चाहिए।

डॉ. धामू ने कहा कि आज परिवार की सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि बच्चा परीक्षा में अच्छे अंक लाए। 100 में से पूरे 100 अंक आएं, नहीं तो 90 या 80 अंक जरूर आएं और कम से कम बच्चा पास हो जाए। समस्या तब शुरू होती है जब बच्चा उम्मीद से कम अंक लाता है। कई बार 19, 12 या 10 अंक आने पर परिवार बच्चे की मेहनत और हालात समझने के बजाय उसे डांटने लगता है। कई मामलों में मारपीट तक की जाती है और उसे यह महसूस कराया जाता है कि वह दूसरों से कमजोर है।

उन्होंने कहा कि इस तरह के व्यवहार के बजाय कम अंकों को सुधार की शुरुआत के तौर पर देखना चाहिए। अगर किसी छात्र ने 10 अंक हासिल किए हैं तो पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि उसने अपनी मौजूदा मेहनत के हिसाब से ये अंक लाए हैं। उसे अपमानित करने के बजाय अगली बार ज्यादा मेहनत के लिए प्रेरित करना चाहिए।

डॉ. धामू ने कहा कि बच्चों को मेहनत और परिणाम का संबंध आसान भाषा में समझाना चाहिए। अगर कम मेहनत पर कुछ अंक मिले हैं तो ज्यादा मेहनत पर उससे बेहतर अंक भी आ सकते हैं। जब बच्चे को यह बात समझ आ जाएगी तो उसके अंदर खुद आगे बढ़ने की इच्छा पैदा होगी।

उन्होंने कहा कि अंकों का दबाव बनाने के बजाय अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि बच्चे को किस विषय में दिक्कत हो रही है, वह कहां कमजोर पड़ रहा है और उसकी पढ़ाई बेहतर करने के लिए किस तरह की मदद चाहिए।

प्रोत्साहन बच्चे के प्रदर्शन को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है। बार-बार कमियां गिनाने और दूसरे छात्रों से तुलना करने के बजाय उसे यह भरोसा दिलाना चाहिए कि वह बेहतर कर सकता है। आत्मविश्वास आने के बाद उसकी सोच और मेहनत दोनों में बदलाव आएगा।

डॉ. धामू ने कहा कि शिक्षा का मतलब सिर्फ किताब पढ़ना और अंक लाना नहीं है। इसमें छात्र और शिक्षक के बीच मजबूत जुड़ाव जरूरी है। शिक्षक सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने वाला नहीं बल्कि छात्र को उसकी क्षमता पहचानने और आगे बढ़ने का रास्ता दिखाने वाला मार्गदर्शक होता है।

उन्होंने कहा कि परीक्षा के अंक किसी बच्चे के पूरे व्यक्तित्व या भविष्य की क्षमता का आखिरी पैमाना नहीं हो सकते। अंक पहचान जरूर बनते हैं लेकिन शिक्षा का असर इससे कहीं बड़ा है। बच्चे को सीखने, समझने और लगातार बेहतर बनने के लिए तैयार करना ही शिक्षा का अहम हिस्सा है।

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