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AIIMS Delhi: एम्स दिल्ली में चार महीने के मासूम की देश की पहली दुर्लभ ‘लंग-सेविंग’ की-होल सर्जरी, डॉक्टरों ने बचाई दोनों फेफड़ों की क्षमता

AIIMS Delhi: एम्स दिल्ली में चार महीने के मासूम की देश की पहली दुर्लभ ‘लंग-सेविंग’ की-होल सर्जरी, डॉक्टरों ने बचाई दोनों फेफड़ों की क्षमता

नई दिल्ली, 15 जुलाई। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली के डॉक्टरों ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए मात्र चार महीने के एक शिशु की देश की पहली दुर्लभ थोरेकोस्कोपिक (की-होल) लंग-सेविंग सेगमेंटेक्टॉमी सफलतापूर्वक की है। जन्मजात फेफड़ों की गंभीर बीमारी कॉनजेनिटल पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (सीपीएएम) से पीड़ित इस मासूम के दोनों फेफड़ों में असामान्य सिस्ट जैसी गांठें थीं, लेकिन डॉक्टरों ने अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए केवल प्रभावित हिस्से को हटाया और स्वस्थ फेफड़ों को सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त की।

एम्स के अनुसार, चार महीने के शिशु में इस प्रकार की की-होल लंग-सेविंग सेगमेंटेक्टॉमी का यह देश का पहला मामला है। इस जटिल सर्जरी के बाद शिशु तेजी से स्वस्थ हुआ और ऑपरेशन के केवल 48 घंटे बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉक्टरों ने बताया कि कुछ महीनों बाद बाएं फेफड़े के प्रभावित हिस्से का भी ऑपरेशन किया जाएगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, शिशु के दोनों फेफड़े जन्म से ही प्रभावित थे। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी बीमारी में फेफड़े का पूरा लोब निकालना पड़ता है, लेकिन दोनों फेफड़ों में समस्या होने के कारण ऐसा करने से भविष्य में बच्चे की श्वसन क्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता था। इसी चुनौती को देखते हुए डॉक्टरों ने केवल संक्रमित हिस्से को हटाने का निर्णय लिया, जिससे स्वस्थ फेफड़े सुरक्षित रह सकें।

ऑपरेशन के दौरान दाएं फेफड़े के सबसे जटिल माने जाने वाले सेगमेंट-9 और सेगमेंट-10 को सफलतापूर्वक हटाया गया। ये हिस्से फेफड़े के सबसे भीतर और निचले भाग में स्थित होते हैं, जहां तक पहुंचना अत्यंत कठिन माना जाता है। आधुनिक कैमरा और विशेष सर्जिकल उपकरणों की सहायता से छोटे-छोटे छिद्रों के माध्यम से पूरी सर्जरी की गई, जिससे बच्चे को कम दर्द हुआ और रिकवरी भी तेज रही।

एम्स के बाल शल्य चिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. संदीप अगरवाला ने बताया कि इतनी कम उम्र के शिशु में की-होल तकनीक से इस स्तर की लंग-प्रिजर्विंग सर्जरी करना तकनीकी दृष्टि से बेहद चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत में बाल शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

सर्जरी का नेतृत्व प्रो. डॉ. विशेष जैन ने किया, जबकि एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. अभिषेक ने ऑपरेशन के दौरान अत्यंत जटिल सेलेक्टिव लंग वेंटिलेशन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इस प्रक्रिया में ऑपरेशन के दौरान केवल एक फेफड़ा शरीर को ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है, जबकि दूसरे फेफड़े पर सर्जरी की जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञ इसे एनेस्थीसिया की सबसे कठिन प्रक्रियाओं में से एक मानते हैं।

डॉक्टरों के अनुसार, चार महीने के शिशु का फेफड़ा बेहद छोटा होता है और उसकी रक्त वाहिकाएं व श्वासनलियां केवल 1 से 2 मिलीमीटर चौड़ी होती हैं। ऐसे में प्रत्येक रक्त वाहिका, ब्रोंकस और ऊतक की सटीक पहचान करना अत्यंत कठिन होता है। मामूली सी चूक भी स्वस्थ फेफड़े को नुकसान पहुंचा सकती थी। इसके बावजूद पूरी मेडिकल टीम ने उच्च तकनीकी दक्षता और आधुनिक उपकरणों की मदद से यह जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की।

एम्स के चिकित्सकों का मानना है कि यह उपलब्धि भविष्य में जन्मजात फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से पीड़ित बच्चों के उपचार के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। इससे न केवल बच्चों के स्वस्थ फेफड़ों को बचाने में मदद मिलेगी, बल्कि उनकी भविष्य की श्वसन क्षमता और जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहेगी। यह सफलता भारत में बाल चिकित्सा और न्यूनतम चीरा (मिनिमली इनवेसिव) सर्जरी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है।

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