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Jarcha Police: जारचा पुलिस पर गंभीर आरोपों में एफआईआर की मांग खारिज, अदालत ने परिवाद के रूप में सुनवाई का आदेश बरकरार रखा

Jarcha Police: जारचा पुलिस पर गंभीर आरोपों में एफआईआर की मांग खारिज, अदालत ने परिवाद के रूप में सुनवाई का आदेश बरकरार रखा

नोएडा। गौतमबुद्ध नगर की सत्र अदालत ने जारचा थाना पुलिस पर मारपीट, लूट, झूठे मुकदमे में फंसाने और सत्ता के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज कराने की मांग संबंधी आपराधिक निगरानी (क्रिमिनल रिवीजन) याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें धारा 173(4) बीएनएसएस के तहत दायर प्रार्थना पत्र पर एफआईआर दर्ज कराने के बजाय उसे परिवाद (कंप्लेंट केस) के रूप में दर्ज कर आगे की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

मामला जारचा थाना क्षेत्र के ऊंचा अमीपुर निवासी अधिवक्ता योगेंद्र सिंह से जुड़ा है। उन्होंने थाना प्रभारी, चौकी प्रभारी समेत कई पुलिसकर्मियों और गांव के कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत के अनुसार दिसंबर 2024 में उन्होंने गांव में एक प्लॉट खरीदने के लिए 2.50 लाख रुपये बतौर बयाना दिए थे, लेकिन बाद में संबंधित पक्ष ने प्लॉट देने से इनकार कर दिया। इसके बाद विवाद बढ़ गया और उनके साथ मारपीट किए जाने का आरोप लगाया गया।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि विवाद के दौरान पुलिस ने निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही प्रताड़ित किया। उनका कहना था कि 28 दिसंबर 2024 को पुलिसकर्मी उन्हें जबरन घर से उठाकर थाने ले गए, उनका मोबाइल फोन छीन लिया, उनके साथ मारपीट की और थाने में बंद कर दिया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी पत्नी को भी गिरफ्तार करने की धमकी दी गई।

शिकायत में आगे कहा गया कि जब उन्होंने मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से की तो पुलिस उनसे रंजिश रखने लगी। आरोप है कि मार्च 2025 में उन्हें रास्ते में रोककर पांच हजार रुपये छीन लिए गए, जान से मारने की धमकी दी गई और उनके कार्यालय में घुसकर मारपीट की गई। शिकायतकर्ता का दावा था कि इन घटनाओं से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उनके पास उपलब्ध हैं।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामले की सुनवाई के बाद एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने के बजाय शिकायत को परिवाद के रूप में दर्ज कर विधिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए सत्र अदालत में आपराधिक निगरानी याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप होने के कारण सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच केवल पुलिस विवेचना के माध्यम से ही संभव है, इसलिए एफआईआर दर्ज कर जांच कराई जानी चाहिए।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि कानून के तहत मजिस्ट्रेट के पास यह विवेकाधिकार है कि वह प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखते हुए एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे या शिकायत को परिवाद के रूप में स्वीकार कर उसकी सुनवाई करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि शिकायतकर्ता के पास अपने आरोपों के समर्थन में पर्याप्त प्रारंभिक साक्ष्य उपलब्ध हैं और वह उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, तो हर मामले में पुलिस जांच आवश्यक नहीं होती।

इन्हीं आधारों पर सत्र अदालत ने आपराधिक निगरानी याचिका को खारिज कर दिया और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। अब मामले की आगे की सुनवाई परिवाद के रूप में न्यायालय में जारी रहेगी।

 

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