Culture Diversity Day: गाजियाबाद में कला, संस्कृति और विरासत का भव्य संगम, युवाओं को भारतीय परंपराओं से जोड़ने पर जोर

Culture Diversity Day: गाजियाबाद में कला, संस्कृति और विरासत का भव्य संगम, युवाओं को भारतीय परंपराओं से जोड़ने पर जोर
रिपोर्ट: अजीत कुमार
गाजियाबाद में 21 मई को ‘संवाद और विकास के लिए विश्व सांस्कृतिक विविधता दिवस’ के अवसर पर एक भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें भारतीय संस्कृति, कला, शिक्षा और राष्ट्रीय विरासत का अनूठा संगम देखने को मिला। कला कल्प सांस्कृतिक संस्थान द्वारा जयपुरिया स्कूल ऑफ बिजनेस में आयोजित इस कार्यक्रम में सैन्य, शैक्षणिक और सांस्कृतिक जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने हिस्सा लिया और भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था, सांस्कृतिक संरक्षण तथा युवाओं की भूमिका पर गंभीर चर्चा की।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इस दौरान मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट कर्नल अरविंद महाजन, इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक डॉ. के.जी. सुरेश, जयपुरिया स्कूल ऑफ बिजनेस के निदेशक डॉ. तपन कुमार नायक, आईजीएनसीए के डीन डॉ. रमेश चंद्र गौर, प्रसिद्ध संगीतकार उस्ताद कमाल साबरी और केरल लोकसाहित्य अकादमी से जुड़े श्री पी.वी. लवलीन उपस्थित रहे। सभी अतिथियों ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम में कला कल्प सांस्कृतिक संस्थान की संस्थापक निदेशक डॉ. अतसी मिश्रा ने मुख्य भाषण दिया। उन्होंने वैश्वीकरण और तकनीकी युग में भारतीय कला और विरासत के सामने खड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. मिश्रा ने कहा कि आज के दौर में कलाकारों के लिए तकनीक केवल सुविधा नहीं बल्कि आर्थिक मजबूती का एक बड़ा माध्यम बन चुकी है। उन्होंने कहा कि यदि कलाकारों को आर्थिक रूप से सशक्त नहीं किया गया तो हमारी प्राचीन परंपराओं और लोक कलाओं का संरक्षण मुश्किल हो जाएगा।
डॉ. अतसी मिश्रा ने इस बात पर भी जोर दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधुनिक तकनीकों को भारतीय कला और संस्कृति से जोड़कर कलाकारों को नए अवसर दिए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता विश्वभर में अपनी अलग पहचान रखती है और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए आधुनिक माध्यमों का उपयोग बेहद जरूरी है।
इसके बाद कला कल्प के उपाध्यक्ष और आरएसएस स्वयंसेवक मोहित माधव ने “कल्चर मैटर्स” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति और परंपराओं से होती है। उन्होंने परिवार और समाज की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि बच्चों और युवाओं को बचपन से ही भारतीय इतिहास, संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों की शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहेगी तभी देश की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह पाएगी।
कार्यक्रम के दौरान आयोजित पैनल डिस्कशन में कला और संस्कृति के क्षेत्र में संभावनाओं, चुनौतियों और आधुनिक बदलावों पर विस्तृत चर्चा हुई। डॉ. के.जी. सुरेश ने ‘सांस्कृतिक स्वतंत्रता’ के महत्व को रेखांकित करते हुए कलाकारों से लगातार नई और रचनात्मक सामग्री तैयार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कला के क्षेत्र में दर्शकों की रुचि बनाए रखने के लिए कलाकारों का बहुमुखी होना आवश्यक है।
प्रसिद्ध संगीतकार उस्ताद कमाल साबरी ने भारतीय कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत और कला की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन किसी भी कलाकार की सफलता का आधार उसका नियमित अभ्यास और समर्पण ही होता है। वहीं, पी.वी. लवलीन ने केरल सरकार और संस्कृति मंत्रालय द्वारा जनजातीय एवं लोक परंपराओं के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी साझा की।
डॉ. रमेश चंद्र गौर और डॉ. तपन कुमार नायक ने परिचर्चा को अकादमिक दृष्टिकोण प्रदान करते हुए भारतीय कला और संस्कृति के अध्ययन तथा शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराओं को केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें शोध और दस्तावेजीकरण के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जाना चाहिए।
यह कार्यक्रम कला कल्प सांस्कृतिक संस्थान के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि भी साबित हुआ। कार्यक्रम के दौरान ‘कला कल्प रिसर्च काउंसिल’ के गठन की आधिकारिक घोषणा की गई। इस परिषद का उद्देश्य प्रदर्शन कला के क्षेत्र में व्यवस्थित शैक्षणिक अध्ययन और शोध को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही संस्थान ने यह भी घोषणा की कि उसे प्रदर्शन कला शिक्षा और उत्कृष्ट दस्तावेजीकरण के लिए आईएसओ प्रमाणन प्राप्त हुआ है।
कार्यक्रम के अंत में शानदार सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे माहौल को मंत्रमुग्ध कर दिया। शास्त्रीय नृत्यांगना दीपशिखा ने ओडिसी नृत्य और आयुषी ने कत्थक नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं। कलाकारों की प्रस्तुतियों ने भारतीय शास्त्रीय कला की समृद्ध परंपरा को जीवंत रूप में मंच पर प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में मौजूद सभी अतिथियों और दर्शकों ने इस आयोजन को भारतीय संस्कृति, कला और विरासत को समर्पित एक प्रेरणादायक पहल बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजन न केवल युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।





