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Yuvraj Mehta case: इंजीनियर की मौत से हिला प्रदेश, फिर भी नहीं जागे अफसर, भ्रष्टाचार के गड्ढे बन रहे मौत का जाल

Yuvraj Mehta case: इंजीनियर की मौत से हिला प्रदेश, फिर भी नहीं जागे अफसर, भ्रष्टाचार के गड्ढे बन रहे मौत का जाल

नोएडा के सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस दर्दनाक हादसे के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों की नींद नहीं टूटी। एक साल पहले बेसमेंट निर्माण के लिए की गई गहरी खुदाई में भरे पानी में डूबकर युवराज की जान चली गई, लेकिन यह हादसा किसी एक चूक का नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे भ्रष्टाचार, लापरवाही और सिस्टम की नाकामी का नतीजा माना जा रहा है। ग्रेटर नोएडा और आसपास के इलाकों में ऐसे कई गड्ढे मौजूद हैं, जो कभी भी किसी और की जिंदगी निगल सकते हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण के बाद किसानों, प्राधिकरण के अधिकारियों और खनन माफिया की मिलीभगत से बीते कई वर्षों से अवैध खुदाई का खेल चल रहा है। मोटी कमाई के इस धंधे में न सिर्फ धरती की कोख को बेरहमी से खोखला किया गया, बल्कि सुरक्षा और जल निकासी जैसे बुनियादी इंतजामों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। ग्रामीण इलाकों से लेकर सेक्टरों, सोसायटियों और मुख्य सड़कों के किनारे तक बेसमेंट खोदने के नाम पर गहरे गड्ढे बना दिए गए। समय के साथ इनमें बारिश और सीवर का गंदा पानी भरता चला गया और ये गड्ढे अब दलदल नुमा तालाब में तब्दील हो चुके हैं।
इन खतरनाक गड्ढों की वजह से आए दिन हादसे हो रहे हैं। कई बार इनमें गिरकर गोवंशों की मौत हो चुकी है और पहले भी कई दर्दनाक घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन हर बार हादसे के बाद जांच और कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई। नतीजा यह हुआ कि लापरवाही का यह सिलसिला लगातार जारी रहा और आखिरकार युवराज मेहता को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
सेक्टर-150 की जिस जगह पर यह हादसा हुआ, वहां निर्माणाधीन बेसमेंट के लिए की गई खुदाई में इतना अधिक पानी भर गया था कि आसपास की सोसायटियों में रहने वाले लोग उसे तालाब समझ बैठे थे। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जब वे यहां रहने आए तो सड़क के किनारे इतना बड़ा जलभराव देखकर किसी को अंदाजा ही नहीं हुआ कि यह बेसमेंट की खुदाई है। कई लोग इसे प्राकृतिक तालाब मानकर मछलियां होने की उम्मीद में दाना तक डालते थे। इस इलाके में गोवंशों का बसेरा भी रहता था और लोग उन्हें यहां खाना खिलाने आते थे।
घटना के बाद सोसायटी के लोगों में गुस्सा और डर दोनों साफ दिखाई दे रहा है। टाटा युरेका सोसायटी के निवासी गोपाल सिंह का कहना है कि उन्हें कभी जानकारी ही नहीं दी गई कि यह जगह बेसमेंट की खुदाई है। उनका आरोप है कि यह दर्दनाक हादसा पूरी तरह जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता और भ्रष्ट व्यवस्था का परिणाम है। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते इन गड्ढों को सुरक्षित किया जाता, चेतावनी बोर्ड लगाए जाते और जल निकासी की व्यवस्था होती, तो शायद युवराज आज जिंदा होते। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस हादसे से सबक लेगा या फिर ऐसे ही भ्रष्टाचार के गड्ढे आगे भी निर्दोष लोगों की जान लेते रहेंगे।

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संवाददाता

Tirthankar Sarkar

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