
Anand Bakshi life Story: रावलपिंडी से मां की तस्वीर साथ लाए थे आनंद बख्शी, विश्व पुस्तक मेले में जीवन और विरासत पर भावनात्मक चर्चा
नई दिल्ली, 13 जनवरी। विश्व पुस्तक मेले के थीम पवेलियन में आयोजित एक विशेष चर्चा सत्र में महान कवि और गीतकार आनंद बख्शी के जीवन, संघर्ष और रचनात्मक विरासत को याद किया गया। इस अवसर पर उनके पुत्र राकेश बख्शी, यूनुस खान, डॉ. शालिनी अगम और संगीता बिजित मौजूद रहीं। वक्ताओं ने आनंद बख्शी के निजी जीवन से जुड़े कई भावनात्मक पहलुओं को साझा किया और बताया कि देश के विभाजन के बाद रावलपिंडी से लौटते समय वे अपनी मां की केवल एक तस्वीर ही अंतिम स्मृति के रूप में साथ ला सके थे, जिसे वे जीवनभर बेहद संजोकर रखते रहे।
चर्चा के दौरान आनंद बख्शी की रचनात्मक प्रक्रिया पर भी विस्तार से बात हुई। वक्ताओं ने बताया कि वे प्रकृति या पुस्तकों से प्रेरणा लेने की बजाय अपने मन की भावनाओं के सहारे गीत रचते थे। अक्सर वे अपने ड्राइंग रूम के किसी शांत कोने या सोफे पर बैठकर शब्दों को आकार देते थे और यही सहजता उनकी रचनाओं को आम लोगों के दिलों से जोड़ देती थी। उनकी लेखनी में जीवन का दर्द, प्रेम और मानवीय संवेदना सहज रूप से झलकती थी, जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा का एक अमर गीतकार बना दिया।
पुस्तक मेले के ऑथर्स कॉर्नर में वरिष्ठ वकील और पूर्व कानून एवं न्याय मंत्री अश्विनी कुमार ने शिबानी सेठी के साथ संवाद करते हुए भारतीय संविधान की स्थायी शक्ति और गरिमा पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाला जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को मजबूत बनाए रखने में युवाओं की भूमिका को अहम बताया और युवा पीढ़ी के आदर्शवाद को देश की सबसे बड़ी ताकत करार दिया।
अश्विनी कुमार ने सार्वजनिक जीवन में करुणा, सहानुभूति और नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इन्हीं मूल्यों के सहारे लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित रह सकता है। उन्होंने सक्रिय नागरिक सहभागिता को गणराज्य की विरासत को आगे बढ़ाने का आधार बताया।
इंटरनेशनल इवेंट कॉर्नर में ‘वर्किंग अक्रॉस टाइम: मेमोरी, आइडेंटिटी एंड हिस्ट्री’ विषय पर आयोजित चर्चा में ऑस्ट्रियाई उपन्यासकार वैलेरी फ्रिट्श और यूक्रेनी लेखक ल्युब्को देरेश ने हिस्सा लिया। इस संवाद में स्मृति, पहचान, इतिहास और मानवीय चेतना जैसे गहन विषयों पर विचार साझा किए गए, जिससे संस्कृतियों और सीमाओं के पार आपसी समझ और सहानुभूति का सेतु बना।
दर्शकों को लोहड़ी की शुभकामनाएं देते हुए ल्युब्को देरेश ने बताया कि उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में लेखन शुरू किया था और संगीत व चेतना की परिवर्तित अवस्थाओं का उनके लेखन पर गहरा प्रभाव रहा है। वहीं वैलेरी फ्रिट्श ने पीढ़ीगत आघात पर चर्चा करते हुए कहा कि संस्कृति और भाषा के साथ-साथ मौन भी विरासत में मिलता है। उन्होंने शब्दों की शक्ति को रेखांकित करते हुए कहा कि केवल 26 अक्षरों से अनंत संसार रचे जा सकते हैं।
इसके बाद क्योको ताकेमोटो द्वारा जापानी भाषा पर कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें जापानी संप्रेषण शैली, सांस्कृतिक दर्शन और वैश्विक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक सहभागिता पर प्रकाश डाला गया। बाल मंडप में भी दिनभर गतिविधियों की रौनक बनी रही, जहां कहानी सत्र, रंगमंच कार्यशालाएं, माइंडफुल आर्ट, खाद्य सुरक्षा पर पोस्टर निर्माण और बाल फिल्म प्रदर्शन के माध्यम से बच्चों की कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता को प्रोत्साहित किया गया।
एम्फीथिएटर में भारतीय सेना बैंड की विशेष प्रस्तुति ने दर्शकों को देशभक्ति के रंग में रंग दिया। अनुशासित और जोशीले वाद्य संगीत ने माहौल को गर्व और उत्साह से भर दिया। इसके बाद आयोजित कवि सम्मेलन में कवियों ने भावनाओं, हास्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पुस्तक मेले में केंद्रीय युवा कार्य एवं खेल राज्य मंत्री रक्षा निखिल खडसे और पूर्व कानून एवं न्याय मंत्री अश्विनी कुमार की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया।





