Indian Astronaut ISS: एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला का बच्चों से संवाद, अंतरिक्ष के सपनों से भारत मंडपम गूंज उठा

Indian Astronaut ISS: एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला का बच्चों से संवाद, अंतरिक्ष के सपनों से भारत मंडपम गूंज उठा

नई दिल्ली, 13 जनवरी: भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक जाने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने विश्व पुस्तक मेले के चौथे दिन भारत मंडपम में स्कूली बच्चों के साथ प्रेरक संवाद किया। एनबीटी-इंडिया के निदेशक युवराज मलिक द्वारा संचालित इस विशेष सत्र में देश के विभिन्न स्कूलों से आए विद्यार्थियों ने अंतरिक्ष, विज्ञान और जीवन से जुड़े सवाल पूछे। ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने अपने शुरुआती दिनों से लेकर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की ऐतिहासिक यात्रा तक का सफर बेहद सरल, ईमानदार और रोचक अंदाज में साझा किया। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में सिर्फ 20 दिन बिताने के लिए उन्हें करीब पांच वर्षों तक कठोर प्रशिक्षण लेना पड़ा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बड़े सपनों के पीछे कितनी मेहनत और अनुशासन छिपा होता है। उन्होंने बच्चों को समझाया कि केवल रोमांचक पलों पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की मेहनत और साधारण कार्यों में भी आनंद खोजना चाहिए। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि फाल्कन-9 रॉकेट के लॉन्च के समय शरीर की हर हड्डी कांप रही थी और सांस लेने तक में कठिनाई हो रही थी, लेकिन उस डर के साथ उत्साह भी था।

उन्होंने अंतरिक्ष में जीवन से जुड़े कई दिलचस्प किस्से सुनाए, जैसे अंतरिक्ष में टूथपेस्ट करना, गेंद की जगह अंतरिक्ष यात्री के साथ बास्केटबॉल खेलना, पृथ्वी पर लौटने के बाद गुरुत्वाकर्षण के कारण संतुलन खो देना और लॉन्च पैड की ओर जाते समय फिल्म ‘फाइटर’ का गीत वंदे मातरम् सुनना। उन्होंने बताया कि जैसे अंतरिक्ष जाने से पहले अभ्यास जरूरी था, वैसे ही धरती पर लौटने के बाद फिर से चलना, संतुलन बनाना और शरीर को ढालना भी एक चुनौती थी। छात्रों को मोबाइल फोन का सकारात्मक उपयोग करने, पढ़ने और सीखने की आदत डालने की सलाह देते हुए उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की पुस्तक ‘विंग्स ऑफ फायर’ पढ़ने की अनुशंसा की। उन्होंने कहा कि डर भविष्य की चिंता है और डर व उत्साह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, हमें हमेशा उत्साह को चुनना चाहिए। इस दौरान उन्होंने भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा को भी याद किया और कहा कि अंतरिक्ष से भारत के लिए कहा गया उनका वाक्य “सारे जहाँ से अच्छा” आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

अपनी कमांडर डॉ. पैगी व्हिटसन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि नौ बार असफल होने के बावजूद वे दुनिया की सबसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्री बनीं, जो दृढ़ संकल्प की मिसाल है। बच्चों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा संस्थानों से नहीं, बल्कि साहस, जिज्ञासा और समर्पण रखने वाले युवाओं से आगे बढ़ेगी और हो सकता है कि यहां बैठा कोई बच्चा भविष्य में भारत का तिरंगा पृथ्वी से परे लेकर जाए। उन्होंने गगनयान मिशन, भारत के अपने अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय भेजने के लक्ष्य पर भी विस्तार से बात की।

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