New Delhi : नई दिल्ली में आयोजित एआई सम्मेलन में मीडिया उद्योग के दिग्गज Uday Shankar ने अपने कीनोट संबोधन में भारत के भविष्य को लेकर एक स्पष्ट और साहसिक दृष्टि प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ तकनीक, रचनात्मकता, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय आकांक्षाएँ एक साथ नई दिशा तय कर रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल तकनीकी प्रयोगशालाओं तक सीमित अवधारणा नहीं रही, बल्कि यह तय कर रही है कि समाज ज्ञान और मूल्य का सृजन कैसे करेगा और वैश्विक मंच पर अपनी पहचान किस रूप में स्थापित करेगा।

अपने संबोधन में उन्होंने एआई को खतरे के बजाय ऐतिहासिक अवसर के रूप में प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि दशकों में पहली बार भारत के पास यह मौका है कि वह केवल एक बड़ा घरेलू कंटेंट बाजार बने रहने के बजाय वैश्विक रचनात्मक शक्ति के रूप में उभरे। उन्होंने वैश्विक मीडिया पर लंबे समय से बने वर्चस्व का उल्लेख करते हुए कहा कि महंगे प्रोडक्शन मॉडल और जटिल वितरण तंत्र के कारण सांस्कृतिक प्रभाव सीमित क्षेत्रों में केंद्रित रहा, जबकि भारत की समृद्ध कथात्मक परंपराएँ अक्सर घरेलू खपत तक सीमित रह गईं।
उदय शंकर ने तर्क दिया कि एआई इन ऐतिहासिक बाधाओं को तोड़ सकता है। यह उत्पादन लागत घटाता है, समय कम करता है और गुणवत्ता को नए स्तर पर ले जाता है। इस परिदृश्य में पूंजी से अधिक महत्व कल्पनाशक्ति और सांस्कृतिक गहराई का होगा। भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को उन्होंने देश की सबसे बड़ी ताकत बताया और कहा कि एआई आधारित अनुवाद और लोकलाइजेशन के माध्यम से स्थानीय कहानियाँ वैश्विक दर्शकों तक पहुंच सकती हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एआई मानव रचनात्मकता का विकल्प नहीं, बल्कि उसका विस्तार है। रोजगार और नैतिकता से जुड़ी आशंकाओं को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि यदि चर्चा केवल भय पर केंद्रित रही तो अवसर छूट जाएंगे। उनके अनुसार, नेतृत्व गति, समन्वय और रणनीतिक स्पष्टता से तय होगा। जो देश समय पर कदम उठाएंगे वही वैश्विक मानक निर्धारित करेंगे।
सार्वजनिक नीति की भूमिका पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि भारत को ऐसा नियामक ढांचा बनाना होगा जो नवाचार का उत्प्रेरक बने, बाधा नहीं। पश्चिमी मॉडल की नकल के बजाय भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों के अनुरूप नीतियां बनानी होंगी। प्रतिभा विकास को उन्होंने दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ बताया और कहा कि भविष्य उन पेशेवरों का है जो कहानी और तकनीक दोनों की समझ रखते हों।
सांस्कृतिक संप्रभुता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि एल्गोरिद्मिक युग में कहानियां केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव का माध्यम बन जाती हैं। भारत को केवल डेटा प्रदाता नहीं, बल्कि कथानक निर्माता के रूप में स्वयं को स्थापित करना होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीकी अवसर स्थायी नहीं होते और देरी नेतृत्व की संभावनाओं को कम कर सकती है।
कीनोट को उद्योग जगत में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसमें स्पष्ट संदेश था कि एआई क्रांति, विशेषकर रचनात्मक क्षेत्रों में, भारत के लिए औद्योगिक इतिहास की पिछली देरी को पीछे छोड़ने का अवसर है। अब निर्णय यह करेगा कि भारत वैश्विक मंच पर नियम तय करने वाला बनेगा या दूसरों द्वारा तय ढांचे में काम करने वाला।

