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MyModiStory : जब 2012 में बैंक मैनेजर से पूछा कि क्या मोदी मॉडल वाकई है, जवाब मिला मोदी देश के लिए क्यों जरूरी हैं!

New Delhi (पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक) : आज हम देश के प्रधानमंत्री, देश ही नहीं विश्व के गौरवशाली नेतृत्व का जन्म दिन मना रहे है। मुझे आज 2012 का वो वाकया याद आ रहा है, जब उस समय के बैंक ऑफ़ इंडिया के ज़ोनल मैनेजर सिंगला मुझसे मिलने आए, बातचीत में मैंने पूछा इससे पहले आप कहाँ थे। उन्होंने बताया कि अभी लुधियाना से आया हूँ, उसके पहले 5 वर्ष गांधीनगर में था। गांधीनगर का नाम आते ही उत्सुकता बढ़ी, मैंने तुरंत पूछा कि गुजरात मॉडल और मोदी की बड़ी चर्चा है, मैने ऐसा जानबूझकर कुछ रफ शब्दों में पूछ, मैं उनसे सही जानकारी लेने का प्रयास किया, मैने पूछा कि वाकई कुछ है भी या सब नाटक है?

सिंगला ने तुरंत उत्तर दिया कि ये व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं बन तो देश का बड़ा दुर्भाग्य होगा। मैं आश्चर्यजनक था क्योंकि इससे पूर्व मैंने मोदीजी के प्रधानमंत्री तक पहुँचने की बात नहीं सुनी थी। मैंने उनसे कारण पूछा तो सिंगला जी ने मोदी की कार्यशैली और क्षमता का वर्णन शुरू कर दिया। मोदी किस तरह से तकनीक का प्रयोग के समर्थक हैं, निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता से युक्त, जनता के साथ संपर्क,जनता से संवाद, ऑनलाइन सुझाव आमंत्रण और कुछ अच्छे सुझावों वाले व्यक्तियों को बुलाकर बड़े सहज भाव से सुनना और कार्यान्वन पर चर्चा करना, ये सब उनकी विशेषता हैं।

सिंगला भी उनमें से थे जिन्होंने अपनी गुजरात पोस्टिंग कर ऑनलाइन कुछ सुझाव दिये थे और मोदी द्वारा एक साधारण बैंकर को आमंत्रित किया गया था और 20 मिनट बड़े सहज भाव से बात हुई थी।

2014 में लोक सभा के चुनाव आने वाले थे, 2013 के शुरुआत में ही मोदी-मोदी की आवाज़ चारों तरफ़ से आने लगी, मेरे सहित हर व्यक्ति या संघ भाजपा की विचारधारा से जुड़ा हर कार्यकर्ता बड़ी आतुरता से प्रतिदिन मोदी को प्रधानमंत्री के चेहरे रूप में चुनाव में प्रस्तुत करने की घोषणा की प्रतीक्षा कर रहा था, एक-एक दिन भारी लगता था। राजनीति है श्रद्धेय लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा जी सहित अनेक वरिष्ठ नेता पीएम इन वेटिंग थे। संघ,जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी बनने तक में इन सबकी बड़ी भूमिका थी।

यहाँ यह समझना होगा राजनीति में भारत ही नहीं बल्कि विकसित देशों में भी पार्टी ही नहीं, नेतृत्व को अधिक तरजीह दी जाती है नेता का करिश्मा सदैव रहा, देश में भी वोट नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी को इंदिरा गांधी की हत्या से उभरी सहानुभूति से एक तरफा वोट पड़ा, उसके बाद कांग्रेस लगभग प्रभावी नेतृत्व विहीन रही और कोई पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बन पायी।

राम जन्म भूमि आंदोलन के बाद भाजपा की उभरती छवि और अटल बिहारी वाजपेयी जैसा नेतृत्व भाजपा सबसे बड़े दल के रूप एनडीए की सरकार बनाने में सक्षम हुई। अटल के बाद लालकृष्ण अडवाणी साफ़ सुथरी छवि के नेता अवश्य थे लेकिन जातिगत समीकरण हों या फिर कुछ और जनता उन्हेंकरिश्माई नेतृत्व के रूप में नहीं देख रही थी।

नरेंद्र मोदी ने लगातार 3 बार मुख्यमंत्री के रूप में एक विशेष छवि लेकर भावी नेतृत्व के रूप में उभर रहे थे और 2013 आते आते उनके नेतृत्व के लिए पार्टी में जन आंदोलन बन गया और इसने पार्टी को मोदी जी को प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में घोषित करने को मजबूर कर दिया, फिर गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में घोषणा के बाद माहौल वोट फॉर इंडिया, वोट फॉर इंडिया के नारे पूरा देश गुंजायमान और उसके बाद गोवा में मोदी जी का भाषण, एक के बाद एक वेदों के श्लोक वासुदेव कुटुंबकम, एकहु विप्रह, सर्वे भवंतु सुखिना…

मोदी में देश ही नहीं विश्व के नेतृत्व की क्षमता दिखायी देने लगी। 2013 में आगरा का भी सौभाग्य था विजय शंखनाद रेली की शुरुआत आगरा से हुई मुझे स्वागताध्यक्ष के रूप में मंच साझा करने का अवसर मिला मुझे उनके उस भाषण का एक एक शब्द अक्षरतः स्मरण है।

2014 में पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने और अपने संसद में प्रवेश से लेकर शपथ समारोह में पड़ोसी देशों को आमंत्रित कर स्पष्ट संदेश दिया कि हमे आपस में नहीं, ग़रीबी से लड़ना है. सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी है, यह अलग बात है पड़ोसी देश जेहादी मानसिकता पर ही रहे, भारत आज विश्व की चौथ अर्थव्यवस्था बन गया और पड़ोसी लगभग पिछले पायदान पर।

उनकी नेतृत्व क्षमता, साहसिक निर्णय, सबका विश्वास सबका साथ ,आत्मनिर्भर भार , 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य और उस ओर तेज़ी से कदम,महामारी में भी लड़ने की क्षमता. इस क्षमता का लोहा आज भारत ही नहीं पूरा विश्व मानता है और आज 75 प्रतिशत अप्रूवल के साथ विश्व के अग्रणी नेता है।

ऐसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 75 वें जन्मदिवस पर कोटिशः बधाई दीर्घ आयु और दीर्घ काल तक देश के नेतृत्व की कामना। जब तक करिश्मा है क्षमता है जनता की स्वीकारता है रिटायरमेंट की सोच भी नहीं आनी चाहिए…अंत में मोदी के लिए निम्न पंक्ति ही उचित है….
कैसे कह दूँ की थक गया हूँ मैं जाने कितनी को हौंसला हूँ मैं।

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