Medical Device Rules: उद्योग को बड़ी राहत, आउटसोर्स स्टरलाइजेशन के लिए अलग लोन लाइसेंस की जरूरत खत्म
नई दिल्ली। देश के मेडिकल डिवाइस उद्योग के लिए केंद्र सरकार ने नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मेडिकल डिवाइसेज रूल्स, 2017 में किए गए संशोधन के बाद अब चिकित्सा उपकरण बनाने वाली कंपनियों को अपने उत्पादों की स्टरलाइजेशन प्रक्रिया किसी वैध लाइसेंसधारी बाहरी केंद्र से कराने के लिए अलग से लोन लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी। इस बदलाव से मेडिकल डिवाइस निर्माताओं की कागजी कार्रवाई कम होने के साथ अनुपालन लागत और मंजूरी में लगने वाले समय में भी कमी आने की उम्मीद है।
अब तक मेडिकल डिवाइस निर्माता यदि स्टरलाइजेशन की प्रक्रिया अपने परिसर के बजाय किसी बाहरी अधिकृत केंद्र से कराते थे, तो इससे जुड़ी अतिरिक्त नियामकीय प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती थी। नए संशोधन के जरिए इस व्यवस्था को आसान बनाया गया है। इससे विशेष रूप से उन कंपनियों को फायदा हो सकता है, जिनके पास अपनी स्टरलाइजेशन सुविधा नहीं है और जो इसके लिए विशेषज्ञ बाहरी केंद्रों की सेवाएं लेती हैं।
हालांकि, नियमों को आसान करने के साथ मेडिकल डिवाइस की ट्रेसेबिलिटी सुनिश्चित करने की व्यवस्था बरकरार रखी गई है। आउटसोर्स स्टरलाइजेशन की स्थिति में मेडिकल डिवाइस के लेबल पर संबंधित स्टरलाइजेशन केंद्र का लाइसेंस नंबर दर्ज करना आवश्यक होगा। इससे जरूरत पड़ने पर यह पता लगाया जा सकेगा कि उपकरण की स्टरलाइजेशन प्रक्रिया किस अधिकृत केंद्र पर की गई थी।
सरकार के इस फैसले से मेडिकल डिवाइस निर्माताओं को अलग लोन लाइसेंस प्राप्त करने में लगने वाले समय और संसाधनों की बचत होने की उम्मीद है। नियामकीय प्रक्रिया सरल होने से विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर के मेडिकल डिवाइस निर्माताओं को अपनी उत्पादन व्यवस्था अधिक प्रभावी तरीके से संचालित करने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही मेडिकल डिवाइस क्षेत्र से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण नियामकीय बदलाव किया गया है। यूरोपीय संघ (ईयू) को अब मान्यता प्राप्त कड़े नियामक क्षेत्राधिकारों की सूची में शामिल किया गया है। इसका फायदा ऐसे पात्र मेडिकल डिवाइसों को मिल सकता है, जिन्हें यूरोपीय संघ में पहले ही नियामकीय मंजूरी मिल चुकी है।
नई व्यवस्था के तहत पात्रता शर्तें पूरी करने वाले ईयू-अनुमोदित मेडिकल डिवाइसों को भारत में क्लीनिकल जांच से संबंधित छूट का लाभ मिल सकेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल हो रहे आधुनिक और उन्नत चिकित्सा उपकरणों को भारतीय बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है।
नियामकीय स्तर पर किए गए इन बदलावों का उद्देश्य मेडिकल डिवाइस उद्योग के लिए कारोबार करना आसान बनाना और अनावश्यक प्रक्रियाओं को कम करना है। इससे कंपनियों की अनुपालन संबंधी जिम्मेदारियों को अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक बनाने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
सरकार का मानना है कि संशोधित व्यवस्था से मेडिकल डिवाइस क्षेत्र में नियामकीय पारदर्शिता बढ़ने के साथ उद्योग को ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ का लाभ मिलेगा। साथ ही नई तकनीक पर आधारित चिकित्सा उपकरणों की भारतीय बाजार तक पहुंच की प्रक्रिया भी अधिक सुगम हो सकेगी।
मेडिकल डिवाइस उद्योग के विस्तार के लिहाज से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नियामकीय प्रक्रियाओं में आसानी से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिलने के साथ नई कंपनियों और निवेशकों के लिए इस क्षेत्र में अवसर बढ़ सकते हैं। वहीं, उन्नत चिकित्सा उपकरणों की बाजार पहुंच तेज होने से इसका अंतिम लाभ मरीजों और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र तक पहुंचने की उम्मीद है।


