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DNA Day 2026: जेनेटिक कोड बदलेगा इलाज, खेती और महामारी से लड़ाई का भविष्य

DNA Day 2026: जेनेटिक कोड बदलेगा इलाज, खेती और महामारी से लड़ाई का भविष्य

नई दिल्ली, 24 अप्रैल: डीएनए डे के अवसर पर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने बताया कि हमारे शरीर में मौजूद डीएनए अब केवल पहचान का साधन नहीं रहा, बल्कि यह भविष्य की स्मार्ट हेल्थ, उन्नत कृषि और महामारी से लड़ाई की सबसे मजबूत नींव बनता जा रहा है। बीमारी की पहचान, इलाज और रोकथाम से लेकर फसल उत्पादन और वैश्विक स्वास्थ्य रणनीतियों तक, हर क्षेत्र में ‘जेनेटिक कोड’ की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूरो बायोकेमिस्ट्री विभाग के प्रोफेसर और डीएनए सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. अशोक शर्मा के अनुसार, 25 अप्रैल 1953 को डीएनए की डबल हेलिक्स संरचना की खोज विज्ञान के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। इसके बाद ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट (2003) ने इंसानी डीएनए का पूरा नक्शा सामने रखा, जिससे अब वैज्ञानिक बीमारी के जोखिम और इलाज की सटीक रणनीति तैयार कर पा रहे हैं।

आज चिकित्सा क्षेत्र में ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ मॉडल की जगह प्रिसीजन मेडिसिन ने ले ली है। इसमें हर व्यक्ति के जेनेटिक प्रोफाइल के आधार पर इलाज तय किया जाता है। कैंसर को अब एक सामान्य बीमारी नहीं, बल्कि जीन और एपिजीनोम में गड़बड़ी के रूप में देखा जा रहा है। वैज्ञानिक संजय गालांडे के अनुसार, जब जीन के ‘बुकमार्क’ बिगड़ जाते हैं, तो कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि शुरू हो जाती है, जिससे कैंसर विकसित होता है।

जेनेटिक कोड की समझ से ‘स्मार्ट’ और लक्षित दवाओं का विकास भी तेजी से हो रहा है। उदाहरण के तौर पर, कुछ स्तन कैंसर मामलों में एचईआर2 जीन की अधिकता को ध्यान में रखते हुए हर्सेप्टिन जैसी दवाएं विकसित की गई हैं। वहीं ‘लिक्विड बायोप्सी’ तकनीक के जरिए अब केवल खून की जांच से ही कैंसर के शुरुआती संकेतों का पता लगाया जा सकता है, जो पारंपरिक एमआरआई या सीटी स्कैन से पहले संभव हो जाता है।

महामारी से लड़ाई में भी जेनेटिक विज्ञान ने अपनी ताकत साबित की है। कोविड-19 के दौरान वायरस के डीएनए/आरएनए कोड को पढ़कर वैज्ञानिकों ने नए वेरिएंट की पहचान की और उसी के अनुसार वैक्सीन को तेजी से अपडेट किया। यह तकनीक भविष्य की महामारियों से निपटने में बेहद अहम भूमिका निभाएगी।

कृषि क्षेत्र में भी जेनेटिक रिसर्च नई संभावनाएं खोल रही है। वैज्ञानिक ऐसी फसलें विकसित कर रहे हैं जो सूखा, अधिक तापमान और बीमारियों को सहन कर सकें। गोल्डन राइस जैसे उदाहरण पोषण सुधार और कुपोषण से लड़ाई में मददगार साबित हो रहे हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा को भी मजबूती मिल रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जेनेटिक कोड आधारित तकनीकों का लाभ आम लोगों तक पहुंचेगा। इससे बीमारियों का जोखिम पहले ही पता चल सकेगा, इलाज अधिक सटीक और प्रभावी होगा, और महामारी से बचाव की रणनीतियां भी मजबूत होंगी।

इस तरह स्वास्थ्य, कृषि और सार्वजनिक नीति—तीनों क्षेत्रों में जेनेटिक कोड आने वाले भविष्य की दिशा तय करेगा और मानव जीवन को अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और सक्षम बनाएगा।

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