नई दिल्ली :भारत में तेजी से पांव पसार रहा पार्किंसंस रोग

नई दिल्ली, 17 दिसम्बर : पार्किंसन रोग (पीडी) भारत में तेजी से पांव पसार रहा है जिसके चलते दुनिया के 10% मरीज केवल भारत में मौजूद हैं। इसे व्यवस्थित रूप से पहचानने और भारतीय स्वास्थ्य देखभाल संदर्भ में उपयुक्त समाधान सुझाने के लिए एम्स दिल्ली में राष्ट्रीय पार्किंसंस सभा चिंतन शिविर का आयोजन किया गया।

इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया, पार्किंसन रोग 60 वर्ष से ज्यादा आयु के लोगों में होने वाला दूसरा सबसे आम न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग है। लेकिन वर्तमान में इसका कोई इलाज नहीं है, हालांकि लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी उपचार उपलब्ध है। इनमें दवाएं, शल्य चिकित्सा और इन्फ्यूजन चिकित्सा शामिल है। इसके अलावा शारीरिक चिकित्सा, स्पीच थेरेपी समेत स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।

एम्स के गति विकार विशेषज्ञ प्रो. अचल श्रीवास्तव ने कहा, भारत में पीडी देखभाल के लिए बड़ी संख्या में मरीज अपनी जेब से भुगतान करते हैं। ऐसे में उन्हें व्यापक बीमा कवरेज की आवश्यकता होती है, जिसे सरकारी योजनाओं में शामिल करके पीडी व अन्य मस्तिष्क विकारों से पीड़ित लोगों को आर्थिक राहत प्रदान की जा सकती है। इस दौरान एम्स के निदेशक प्रो एम श्रीनिवास, न्यूरोसाइंसेज सेंटर के प्रमुख प्रो शैलेश गायकवाड़, न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रो मंजरी त्रिपाठी और राष्ट्रीय मस्तिष्क स्वास्थ्य कार्य बल के अध्यक्ष प्रोफेसर आर के धमीजा मौजूद रहे।

क्या है पार्किंसंस ?
पार्किंसंस रोग एक मस्तिष्क विकार है। यह एक दीर्घकालिक और प्रगतिशील रोग है, जो धीरे-धीरे बढ़ता है और ठीक नहीं होता। इस रोग में, मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाता। जो एक रासायनिक संदेशवाहक (न्यूरोट्रांसमीटर) है। डोपामाइन की कमी से मांसपेशियां कड़ी हो जाती हैं और चलने में दिक्कत होती है।

इलाज
पार्किंसंस रोग के लक्षणों को दवाओं से नियंत्रित करने में मदद मिल सकती हैं, जो अक्सर बहुत अच्छी तरह से काम करती हैं। जब दवाएं काम नहीं करती हैं, तो कुछ लोगों को सर्जरी करवानी पड़ सकती है। स्वास्थ्य सेवा टीम एरोबिक व्यायाम, संतुलन और स्ट्रेचिंग पर केंद्रित शारीरिक चिकित्सा और स्पीच थेरेपी की भी सलाह दे सकती है।

दवाइयां
दवाइयां चलने, हरकत करने और कंपन से जुड़ी समस्याओं को ठीक करने में मदद कर सकती हैं। ये दवाइयां मस्तिष्क में डोपामाइन को बढ़ाकर या उसकी जगह ले कर काम करती हैं। पार्किंसंस रोग से पीड़ित लोगों के मस्तिष्क में डोपामाइन का स्तर कम होता है। लेकिन डोपामाइन सीधे नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह मस्तिष्क में प्रवेश नहीं कर सकता। आमतौर पर दवाएं लक्षणों को अच्छी तरह से नियंत्रित करती हैं।

ममूटी ने कहा कि उन्हें ‘मेगास्टार’ की उपाधि पसंद नहीं है, उन्हें लगता है कि उनके जाने के बाद लोग उन्हें याद नहीं रखेंगे

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