POCSO Case: गवाहों के बयान से पलटने पर यौन शोषण के दो आरोपी बरी, अदालत ने कहा- संदेह से परे साबित नहीं हुए आरोप
नोएडा। थाना इकोटेक-3 क्षेत्र में दो नाबालिग बहनों के कथित यौन शोषण से जुड़े मामले में पॉक्सो अदालत ने दो आरोपियों को बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान पीड़िताओं के पिता और दोनों पीड़िताओं सहित अभियोजन पक्ष के तीनों प्रमुख गवाह अदालत में अपने पूर्व बयानों से पलट गए। अदालत ने कहा कि जब प्रत्यक्ष गवाह ही घटना से इनकार कर रहे हैं तो केवल दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामला नौ सितंबर 2025 को इकोटेक-3 थाने में दर्ज किया गया था। पीड़िताओं के पिता की ओर से पुलिस को दी गई तहरीर के आधार पर दोनों आरोपियों के खिलाफ संबंधित धाराओं और पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू की गई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि माता-पिता के काम पर चले जाने के दौरान आरोपी घर आते थे और नाबालिग बेटियों का कथित रूप से यौन शोषण करते थे। आरोप यह भी था कि पीड़िताओं की आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो बनाए गए तथा उन्हें वायरल करने की धमकी दी गई।
पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामले की जांच की और पीड़िताओं के बयान दर्ज किए। जांच की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद मामले की सुनवाई पॉक्सो अदालत में शुरू हुई।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल तीन प्रमुख गवाहों को अदालत में पेश किया गया। इनमें पीड़िताओं के पिता और दोनों नाबालिग पीड़िताएं शामिल थीं। हालांकि अदालत में गवाही के दौरान तीनों अपने पहले दिए गए बयानों से पलट गए।
पीड़िताओं के पिता ने अदालत में दिए बयान में कहा कि आरोपियों ने उनकी बेटियों के साथ कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाए। उनके इस बयान के बाद अभियोजन पक्ष के मामले को महत्वपूर्ण झटका लगा।
दोनों पीड़िताओं ने भी अदालत के सामने आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों का समर्थन नहीं किया। उन्होंने गवाही में कहा कि उनके पूर्व बयान पुलिस के कहने पर दिए गए थे। पीड़िताओं ने आरोपियों की ओर से शादी का झांसा दिए जाने या उनके साथ किसी तरह का गलत काम किए जाने से भी इनकार किया।
एक पीड़िता ने अदालत के सामने यह भी कहा कि वह एक आरोपी से विवाह करना चाहती है और उसे बरी किया जाए। इस प्रकार मामले से सीधे जुड़े तीनों प्रमुख गवाहों ने अदालत में अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया।
सुनवाई के दौरान एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, साइट मैप और चार्जशीट सहित मामले से संबंधित दस्तावेज भी अदालत के समक्ष रखे गए। आरोपियों की ओर से पेश अधिवक्ता ने इन दस्तावेजों की सत्यता को स्वीकार किया था।
अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि दस्तावेजों की सत्यता स्वीकार किए जाने मात्र से आरोप सिद्ध नहीं हो जाते। जब घटना से जुड़े प्रत्यक्ष गवाह अदालत में आरोपों से इनकार कर चुके हों तो केवल दस्तावेजी सामग्री के आधार पर दोषसिद्धि करना उचित नहीं होगा।
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयान और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ।
अदालत ने आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के लिए आवश्यक प्रमाण के मानक को ध्यान में रखते हुए दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ दिया और मामले में बरी करने का आदेश सुनाया।
इस फैसले के साथ दोनों आरोपियों को इस मुकदमे में लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया गया। अदालत का निर्णय सुनवाई के दौरान पेश साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर दिया गया।


