Export Crisis: युद्ध के असर से नोएडा-ग्रेटर नोएडा का निर्यात ठप, किराया 10 गुना बढ़ा, बीमा बंद

Export Crisis: युद्ध के असर से नोएडा-ग्रेटर नोएडा का निर्यात ठप, किराया 10 गुना बढ़ा, बीमा बंद
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के निर्यात कारोबार पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव का बड़ा असर देखने को मिल रहा है। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर दिया है, जिसका सीधा असर स्थानीय उद्योगों और निर्यातकों पर पड़ा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि विदेशों में माल भेजना बेहद महंगा और जोखिम भरा हो गया है।
निर्यातकों के मुताबिक, माल ढुलाई का किराया अचानक कई गुना बढ़ गया है। पहले मुंबई से दुबई तक समुद्री मार्ग से कंटेनर भेजने का खर्च करीब 300 से 350 डॉलर होता था, लेकिन अब यही किराया बढ़कर 3200 से 3500 डॉलर तक पहुंच गया है। निजी एजेंटों द्वारा बढ़ाए गए इस भारी-भरकम शुल्क के कारण कई निर्यातक अपने ऑर्डर रोकने को मजबूर हो गए हैं।
जानकारों के अनुसार, नोएडा-ग्रेटर नोएडा से हर महीने 1000 करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात होता है, लेकिन मौजूदा हालात में यह कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। कई उद्योगों ने उत्पादन धीमा कर दिया है, क्योंकि समय पर शिपमेंट न पहुंचने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
स्थिति को और गंभीर बनाते हुए कूरियर और लॉजिस्टिक कंपनियों ने युद्ध के चलते शिपमेंट का बीमा भी बंद कर दिया है। पहले निर्यातक अपने माल का बीमा कराते थे, जिससे नुकसान की स्थिति में उन्हें मुआवजा मिल जाता था, लेकिन अब बिना बीमा के माल भेजना एक बड़ा जोखिम बन गया है। यदि शिपमेंट खो जाता है या क्षतिग्रस्त होता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी निर्यातक पर ही होगी।
डिलीवरी में हो रही देरी ने भी कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है। जहां पहले यूरोप या अन्य देशों में माल तीन दिन के भीतर पहुंच जाता था, अब वही शिपमेंट 10 से 15 दिनों में भी नहीं पहुंच पा रहा है। एक निर्यातक ने बताया कि उन्होंने करीब 30 लाख रुपये का माल बेल्जियम भेजा, जो तय समय से काफी देरी के बाद भी नहीं पहुंचा। इससे उनके व्यापारिक संबंधों पर भी असर पड़ रहा है और ऑर्डर रद्द होने का खतरा बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही वैश्विक हालात सामान्य नहीं होते हैं, तो इसका असर भारत के निर्यात सेक्टर पर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है। ऐसे में सरकार और उद्योग संगठनों को मिलकर वैकल्पिक लॉजिस्टिक समाधान और निर्यातकों को राहत देने के उपाय तलाशने होंगे, ताकि इस संकट से उबरने में मदद मिल सके।





