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AIIMS Delhi: देर तक बैठने और खराब मुद्रा से बच्चों की रीढ़ प्रभावित, लड़कियों में 6-7 गुना अधिक मामले: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली

AIIMS Delhi: देर तक बैठने और खराब मुद्रा से बच्चों की रीढ़ प्रभावित, लड़कियों में 6-7 गुना अधिक मामले: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली

नई दिल्ली, 27 फरवरी। बच्चों में देर तक बैठने की आदत और खराब शारीरिक मुद्रा (पोश्चर) उनकी रीढ़ की हड्डी के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में रीढ़ की विकृतियों के मामले बढ़कर लगभग 1 से 2 प्रतिशत तक पहुंच गए हैं, जो देश की विशाल आबादी को देखते हुए चिंताजनक आंकड़ा है। खास बात यह है कि लड़कियों में यह समस्या लड़कों की तुलना में 6 से 7 गुना अधिक पाई जा रही है।

यह जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के अस्थि रोग विशेषज्ञ (रीढ़) एवं प्रोफेसर भावुक गर्ग ने बच्चों की रीढ़ की बीमारियों पर केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए दी। उन्होंने बताया कि आजकल बच्चों में लंबे समय तक पढ़ाई, मोबाइल और कंप्यूटर के उपयोग के कारण बैठने की अवधि बढ़ गई है, जिससे रीढ़ पर असामान्य दबाव पड़ता है और संरचनात्मक विकृतियां विकसित हो सकती हैं।

इस वर्ष सम्मेलन का मुख्य विषय ‘इडियोपैथिक स्कोलियोसिस’ है, जो बच्चों और किशोरों में पाई जाने वाली रीढ़ की जटिल विकृति है। यह बीमारी रीढ़ की हड्डी को असामान्य रूप से टेढ़ा कर देती है, जिससे शारीरिक बनावट, फेफड़ों की कार्यक्षमता और समग्र स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।

तीन दिवसीय इस सम्मेलन का आयोजन एम्स के ऑर्थोपेडिक्स विभाग द्वारा विभिन्न चिकित्सा संस्थानों के सहयोग से जेएलएन ऑडिटोरियम में किया जा रहा है। सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञ बाल स्पाइन सर्जरी से जुड़ी नई तकनीकों और अनुसंधानों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।

प्रोफेसर गर्ग ने बताया कि इस मंच पर अत्याधुनिक उपचार पद्धतियों को प्रस्तुत किया जा रहा है। इनमें मैग्नेटिकली कंट्रोल्ड ग्रोइंग रॉड्स, शुरुआती स्कोलियोसिस के लिए टेथरिंग तकनीक, एक्टिव एपेक्स कंप्रेशन सिस्टम और रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी जैसी उन्नत विधियां शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य कम उम्र के बच्चों में रीढ़ की विकृति को नियंत्रित करना और जहां तक संभव हो, फ्यूजन सर्जरी की आवश्यकता को टालना है।

सम्मेलन में विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि स्कोलियोसिस का प्रभाव केवल रीढ़ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गंभीर मामलों में यह फेफड़ों की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में समय पर पहचान और उचित उपचार अत्यंत आवश्यक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत में बाल स्पाइन रोगों के उपचार और अनुसंधान को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। साथ ही अभिभावकों को भी बच्चों की बैठने की आदत, शारीरिक गतिविधियों और सही मुद्रा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, ताकि भविष्य में गंभीर समस्याओं से बचा जा सके।

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