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Bengal SIR voter list: बंगाल में मतदाता सूची का मसौदा जारी, 58 लाख से अधिक नाम हटे, चुनाव आयोग ने दी दावों और आपत्तियों की पूरी राहत

Bengal SIR voter list: बंगाल में मतदाता सूची का मसौदा जारी, 58 लाख से अधिक नाम हटे, चुनाव आयोग ने दी दावों और आपत्तियों की पूरी राहत

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित कर दिया है, जिसके तहत 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मसौदा सूची से नाम हटने का मतलब किसी भी मतदाता के लिए चुनावी प्रक्रिया से बाहर होना नहीं है और प्रभावित लोग तय समयसीमा के भीतर अपने दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं। यह मसौदा ऐसे समय जारी हुआ है, जब राज्य में अगले वर्ष की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है और मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक माहौल पहले से ही गर्म है।

चुनाव आयोग के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद पश्चिम बंगाल की मसौदा मतदाता सूची में कुल 7,08,16,631 मतदाताओं के नाम दर्ज किए गए हैं। इससे पहले जनवरी 2025 की मतदाता सूची में 7,66,37,529 मतदाता थे। इस तरह कुल 58,20,898 नाम हटाए गए हैं। आयोग के अधिकारियों ने बताया कि नाम हटाने के पीछे मृत्यु, स्थायी पलायन, पता न मिल पाना, दोहरे पंजीकरण और जनगणना प्रपत्र जमा न करने जैसे कई कारण सामने आए हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, हटाए गए नामों में से 24,16,852 मतदाताओं को मृत घोषित किया गया है। इसके अलावा 19,88,076 मतदाता स्थायी रूप से अपने पंजीकृत पते से स्थानांतरित हो चुके थे। करीब 12,20,038 मतदाता ऐसे पाए गए जिनका पता नहीं चल सका या जो अपने दर्ज पते पर उपलब्ध नहीं थे। लगभग 13 लाख मतदाताओं के नाम दोहरे पंजीकरण के कारण हटाए गए, जबकि 1,83,328 नामों को फर्जी मतदाता के रूप में चिह्नित किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य तकनीकी और प्रक्रियागत कारणों से 57,000 से अधिक नाम सूची से बाहर किए गए हैं।

चुनाव आयोग ने बताया कि मसौदा मतदाता सूची, हटाए गए नामों की बूथवार जानकारी और नाम हटाने के कारण पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक वेबसाइट, चुनाव आयोग के मतदाता पोर्टल और ECINET एप्लिकेशन पर उपलब्ध करा दिए गए हैं। इसके साथ ही हटाए गए मतदाताओं की अलग सूची भी एक विशेष पोर्टल पर अपलोड की गई है, ताकि नागरिक यह जांच सकें कि उनका या उनके परिवार के किसी सदस्य का नाम किस कारण से हटाया गया है।

आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मसौदा सूची के प्रकाशन के बाद प्रभावित मतदाताओं के लिए सुनवाई की प्रक्रिया लगभग एक सप्ताह के भीतर शुरू की जाएगी। इस बीच नोटिसों की छपाई, संबंधित मतदाताओं को सूचना भेजने और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने का काम किया जाएगा। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि 16 दिसंबर 2025 से 15 जनवरी 2026 तक दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाएंगी। इस अवधि के दौरान जिन मतदाताओं के नाम मसौदा सूची में नहीं हैं, वे घोषणा पत्र और आवश्यक दस्तावेजों के साथ फॉर्म-6 भरकर अपना दावा पेश कर सकते हैं।

पश्चिम बंगाल के विशेष मतदाता सूची पर्यवेक्षक और पूर्व नौकरशाह सुब्रता गुप्ता ने जनता से अपील की है कि वे घबराएं नहीं। उन्होंने बताया कि करीब 30 लाख ऐसे मतदाता हैं, जिनका विवरण 2002 की मतदाता सूची से मेल नहीं खा सका है। इन सभी को सुनवाई के लिए बुलाया जाएगा और अंतिम निर्णय से पहले उन्हें दस्तावेज प्रस्तुत कर अपनी पात्रता साबित करने का पूरा मौका दिया जाएगा।

मसौदा सूची के औपचारिक प्रकाशन से पहले ही बूथ लेवल ऑफिसर एप्लिकेशन पर नाम दिखने शुरू हो गए थे, जिससे राज्य में राजनीतिक बहस तेज हो गई थी। मंगलवार को सूची जारी होने के बाद आयोग ने सभी मतदाताओं से अपील की कि वे ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से या अपने स्थानीय बीएलओ कार्यालय जाकर अपने नामों का सत्यापन करें। बूथ स्तर पर मसौदा सूची की हार्ड कॉपी भी उपलब्ध कराई जाएगी और बीएलओ को प्रकाशन के दिन बूथों पर उपस्थित रहने को कहा गया है।

मतदाता सूची के प्रकाशन के साथ ही राजनीतिक टकराव भी बढ़ गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा और चुनाव आयोग पर संयुक्त साजिश का आरोप लगाते हुए दावा किया कि बड़े पैमाने पर सुनवाई की बात कहकर लोगों को डराया जा रहा है और उनकी नागरिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। टीएमसी नेताओं ने कहा कि यह भय पैदा करने का एक संगठित प्रयास है और पार्टी हर मतदाता के अधिकारों की रक्षा करेगी।

वहीं भाजपा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने टीएमसी के दावों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह तो केवल शुरुआत है और अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी। उन्होंने कहा कि आयोग के कार्यक्रम के अनुसार 14 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद ही वे विस्तृत प्रतिक्रिया देंगे।

एसआईआर प्रक्रिया के दौरान राज्य के कुछ हिस्सों में हुई मौतों को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। टीएमसी ने आरोप लगाया है कि एसआईआर से जुड़ी दहशत के कारण अब तक चार बीएलओ सहित 40 आम नागरिकों की मौत हुई है, जिनमें आत्महत्याएं भी शामिल हैं। भाजपा ने इन दावों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा है कि सत्तारूढ़ पार्टी मानवीय त्रासदियों का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है।

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