नई दिल्ली, 23 अक्तूबर : दिवाली पर बम-पटाखे चलाने के दौरान अपनी आंखों की रोशनी गंवाने वाले बच्चों और वयस्कों की वीरवार को दो अस्पतालों में सर्जरी संपन्न की गई। इनमें से 20 मरीजों को एम्स दिल्ली में और 22 मरीजों को गुरु नानक नेत्र केंद्र (जीएनईसी) में उपचार प्रदान किया गया।
एम्स के डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेत्र केंद्र (आरपीसी) के कैजुअल्टी विभाग के प्रमुख डॉ. राजपाल वोहरा ने कहा, अगर पटाखे चलाने के दौरान लोग सावधानी बरतते तो गंभीर मामलों में कमी लाई जा सकती थी। बम-पटाखों के धमाकों और बारूद ने बच्चों और बड़ों के साथ राहगीरों और नजदीक खड़े लोगों को भी घायल कर दिया। डॉ वोहरा ने कहा, इन तीन-चार दिनों में 110 मरीज आंख पर चोट के कारण अस्पताल आए थे। इनमें 90 फीसदी 20 साल से कम उम्र के हैं। वहीं, ज्यादातर बच्चे 5 से 15 साल के हैं। इनमें से 20 मरीजों की आंखों में गंभीर चोट है। उन्हें दिखना बंद हो गया है। गंभीर चोट के कारण आंखों के अंदर की नस फटने से खून जमा हो गया है। इसके चलते ही मरीज को दिखना बंद हो जाता है, इसे हाइफेमा कहते हैं। उन्होंने कहा, आंख की गंभीर चोटों से पीड़ित मरीजों के कॉर्निया की मरम्मत की गई है। उम्मीद है उनकी आंख की रोशनी लौट आएगी।
जीएनईसी की निदेशक प्रोफेसर डॉ. कीर्ति सिंह ने कहा, हमारे अस्पताल में करीब 22 ऐसे मरीज आए हैं जिनकी आंख की रोशनी चली गई है। बम -पटाखों के धमाके से किसी की आंख का कॉर्निया फट गया है तो किसी की आंख में गहरा जख्म हो गया है। इनमें छह साल के बच्चों से लेकर 25 साल तक के वयस्क शामिल हैं। उन्होंने बताया घायलों में शामिल एक बच्चे का चेहरा सुतली बम चलाते समय झुलस गया है। आंख के अंदर गंभीर चोट आई है। इसके आंख के अंदर व बाहर खून आ गया है। कॉर्निया में भी सूजन आ गई है, जिससे उसे दिखना बंद हो गया है। सभी 22 मरीजों की सर्जरी कर रहे हैं। मगर 50 फीसदी घायलों की रोशनी ही वापस आने की उम्मीद है। डॉ कीर्ति सिंह के मुताबिक इमरजेंसी में आए आंख की चोट वाले मरीजों में 40 फीसदी ऐसे हैं, दूर खड़े थे। इसके बावजूद पटाखे की चपेट में आ गए।
एम्स के बर्न विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल ने बताया कि दिवाली पर गंभीर रूप से जले हुए करीब 85 मरीजों को भर्ती किया गया है। इनमें बम धमाकों में घायल मरीज भी हैं। अनेक मरीजों के हाथ बम के धमाके से फट गए हैं। उंगलियां और अंगूठे हथेली से बिलकुल अलग हो गए हैं। उन्होंने बताया कि अनार, पोटाश गन और सुतली बम से मरीजों को गंभीर नुकसान पहुंचा है। डॉ सिंघल ने कहा,अंगभग वाले मरीजों की प्लास्टिक सर्जरी की जा रही है और आग व पटाखों से जले मरीजों के संक्रमण में कमी लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अगले 4 से 5 दिन में उनकी भी प्लास्टिक सर्जरी की जाएगी।
घटनाओं के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार
डॉ. राजपाल वोहरा के मुताबिक पटाखे चलाने के दौरान बच्चों पर निगरानी रखनी बेहद जरुरी होती है। करीब दो दशक पहले माता-पिता या घर का कोई बड़ा सदस्य दिवाली पर पटाखे चलाने के समय बच्चों के संग मौजूद रहता था। लेकिन अब माता-पिता मोबाइल फोन, लैपटॉप और सोशल मीडिया के प्रयोग में व्यस्त रहते हैं। आपस में और बच्चे से भी बातचीत कम करते हैं। अधिकांश लोग कामकाजी या न्यूक्लियर फैमिली होने के चलते बच्चे की हर डिमांड पूरी करते हैं। मोह के चलते गलती करने पर भी बच्चे को डांटने से बचते हैं जिससे बच्चों में जिद और गुस्से जैसे अवगुण विकसित होने लगते हैं और वे जरुरत से ज्यादा शरारती हो जाते हैं।
शरारतों पर अंकुश लगा सकता है मेडिटेशन
डॉ. वोहरा ने कहा, पटाखे चलाकर बच्चों और बड़ों को आंतरिक खुशी मिलती है। जो दिमाग में एंडोर्फिन नामक हार्मोन पैदा होने से महसूस होती है। अक्सर बच्चों को बम जलाकर बाहर फेंकना और किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु को निशाना बनाकर नुकसान पहुंचाने की कोशिश करना अच्छा लगता है जिससे बड़ी दुर्घटना हो जाती है। अगर इन बच्चों को डीप ब्रीथिंग, मेडिटेशन और योग के अभ्यास कराए जाएं तो दिमाग में एंडोर्फिन रिलीज होगा और चित्त शांत होगा। इससे दिवाली पर होने वाली घटनाओं में कमी लाई जा सकेगी।
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