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US-India Trade Deal नोएडा में अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के विरोध में भारतीय किसान यूनियन का प्रदर्शन

US-India Trade Deal नोएडा में अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के विरोध में भारतीय किसान यूनियन का प्रदर्शन

नोएडा। अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के विरोध में गुरुवार को भारतीय किसान यूनियन ने गौतम बुद्ध नगर के जिला मुख्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया। जिला अध्यक्ष रॉबिन नागर के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसानों और संगठन के पदाधिकारियों ने एकत्र होकर सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई। प्रदर्शन के दौरान मुख्य प्रशासनिक अधिकारी अनुराग सारसवत्स को राष्ट्रपति के नाम संबोधित एक ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें इस प्रस्तावित व्यापार समझौते को तत्काल रद्द करने की मांग की गई।
रॉबिन नागर ने कहा कि देशभर के किसान संगठन इस समझौते को किसान विरोधी मानते हैं और इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति को अवगत कराया गया है कि यदि यह समझौता लागू होता है तो इसका सीधा असर देश के करोड़ों किसानों की आजीविका पर पड़ेगा। उनके अनुसार यह केवल व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
नागर ने तर्क दिया कि अमेरिका की कृषि प्रणाली भारी सरकारी सब्सिडी और अत्याधुनिक मशीनीकरण पर आधारित है। वहां के किसान बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं, जिससे उनकी लागत कम हो जाती है। यदि भारत सोयाबीन, मक्का, गेहूं, दालें और डेयरी उत्पादों पर आयात शुल्क में कमी करता है, तो सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में बड़ी मात्रा में प्रवेश करेंगे। इससे भारतीय किसानों को अपनी उपज के उचित दाम नहीं मिल पाएंगे और वे प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के किसान पहले से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में विदेशी सस्ते उत्पादों की आमद उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर सकती है। खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह समझौता गंभीर संकट पैदा कर सकता है, क्योंकि उनकी उत्पादन क्षमता और संसाधन सीमित हैं।
डेयरी क्षेत्र को लेकर भी भारतीय किसान यूनियन ने चिंता जताई। नागर ने कहा कि भारत का डेयरी मॉडल सहकारी व्यवस्था पर आधारित है, जिसमें छोटे और सीमांत किसान अहम भूमिका निभाते हैं। यदि अमेरिकी डेयरी उत्पादों को भारतीय बाजार में आसान प्रवेश मिलता है, तो लाखों दुग्ध उत्पादक परिवारों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है और सहकारी ढांचा कमजोर हो सकता है।
बीज और बौद्धिक संपदा अधिकारों के मुद्दे पर भी संगठन ने आपत्ति जताई। नागर ने कहा कि अमेरिकी कंपनियां पेटेंट आधारित बीज प्रणाली और बौद्धिक संपदा कानूनों के माध्यम से बाजार पर नियंत्रण रखती हैं। यदि ऐसे प्रावधान भारत में प्रभावी होते हैं, तो पारंपरिक बीज संरक्षण और किसान की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। भारतीय किसान लंबे समय से पारंपरिक बीजों के संरक्षण और आदान-प्रदान की व्यवस्था पर निर्भर रहे हैं। ऐसे में बीज कंपनियों का बढ़ता नियंत्रण किसानों की स्वतंत्रता के लिए चुनौती बन सकता है।
जिला मीडिया प्रभारी सुनील प्रधान ने कहा कि यह मुद्दा केवल आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसान की आय, ग्रामीण रोजगार, खाद्य सुरक्षा और देश की आर्थिक स्वायत्तता से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने मांग की कि सरकार किसानों की राय को प्राथमिकता दे और किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते से पहले व्यापक चर्चा सुनिश्चित करे।
प्रदर्शन के दौरान किसानों ने नारेबाजी करते हुए चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। प्रशासन ने ज्ञापन प्राप्त कर उसे संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का आश्वासन दिया है।

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