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नेत्रदान के प्रति समाज में जागरूकता लाएं देशवासी : एम्स

- समाज में किसी भी मृत्यु की जानकारी मिलने पर संबंधित परिजनों को नेत्रदान के लिए करें प्रेरित

नई दिल्ली, 2 सितम्बर: क्रोनिक रोग, कॉर्नियल ऑपेसिटी, दुर्घटना व अन्य कारणों से प्रतिवर्ष करीब एक लाख लोग अपनी आंखों की रोशनी गंवा देते हैं और दिव्यांग हो जाते हैं। हालांकि, इनमें से करीब 50 हजार लोगों को नेत्रदान के जरिये प्राप्त कॉर्निया के प्रत्यारोपण से रोशनी मिल जाती है लेकिन करीब 50 हजार लोगों के जीवन में छाया अंधकार दूर नहीं हो पाता है।

यह बात एम्स दिल्ली के डॉ राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र स्थित राष्ट्रीय नेत्र बैंक के वरिष्ठ डॉक्टर राधिका टंडन ने ‘राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े’ (25 अगस्त से 5 सितम्बर) के तहत सोमवार को कही। उनके साथ वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ तुषार अग्रवाल, डॉ मनप्रीत कौर, डॉ नूपुर और डॉ तविश भी मौजूद रहे। डॉ टंडन ने कहा कि दृष्टि एक अनमोल उपहार है जिसे मानव ही मानव को दे सकता है। लेकिन समाज में नेत्रदान के प्रति उदासीनता बनी हुई है जिसके चलते हजारों लोग दिव्यांगता का जीवन जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

उन्होंने कहा, स्वैच्छिक नेत्रदान को बढ़ावा देना बहुत जरुरी है। इसके लिए हमें अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिजनों को जागरूक करना होगा कि समाज में किसी भी मृत्यु की जानकारी मिलने पर संबंधित परिजनों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करें ताकि नेत्रहीनता से पीड़ित व्यक्तियों के जीवन में नई सुबह लाई जा सके। हालांकि, भारत में नेत्रदान करने के लिए कोई उम्र सीमा तय नहीं है लेकिन परिवार की सहमति जरूरी है। कानून के मुताबिक प्रत्येक आयु वर्ग के लोग मृत्यु के बाद नेत्रदान कर सकते हैं।

बच्चों की आंख में न लगे चोट रहें सतर्क
अक्सर घर, बाहर या स्कूल में खेलकूद व अन्य गतिविधियों के दौरान बच्चे चोटिल हो जाते हैं। इन चोटों में आंख की चोट बच्चे के भविष्य के दृष्टिगत खतरनाक साबित होती है। इसलिए माता -पिता अपने बच्चों को गिल्ली डंडा, ज्योमेट्रिकल कंपास, तीर कमान, होली के रंग और अन्य नुकीली वस्तुओं से ना खेलने दें। बच्चों के खेल के प्रति सतर्कता बरतें और निगरानी रखें।

देश में अंधेपन का दूसरा कारण कॉर्निया अल्सर
भारत में अंधेपन का दूसरा बड़ा कारण कॉर्निया अल्सर या इंफेक्शन है। इसमें व्यक्ति का कॉर्निया गल जाने के चलते सिकुड़ जाता है, परिणामस्वरूप कॉर्निया प्रत्यारोपण करना पड़ता है जो कुल प्रत्यारोपण का 40% है । उसके अलावा मोतियाबिंद की सर्जरी के दौरान भी कॉर्निया खराब हो जाता है और ट्रांसप्लांट करना पड़ता है। ऐसे 224 मामले सामने आए हैं। वहीं, आंख में चोट लगने व संक्रमण होने की वजह से 590 ट्रांसप्लांट किए गए हैं।

एक साल में 85% कॉर्निया प्रत्यारोपण संपन्न
राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने पिछले 58 वर्षों में 32 हजार से अधिक कॉर्निया एकत्र करके देश में नेत्र बैंकिंग का चेहरा बदल दिया है। इस दौरान कॉर्नियल प्रत्यारोपण के माध्यम से देश भर के 23 हजार से अधिक लोगों को आंखों की रोशनी प्रदान की गई। हालांकि कोविड 19 महामारी के दौरान नेत्र बैंक सेवा बुरी तरह प्रभावित हुई लेकिन पिछले तीन साल से लगातार सालाना एक हजार कॉर्निया प्रत्यारोपण किया जा रहा है। वहीं, वर्ष 2023-24 में नेत्रदान के जरिये प्राप्त 2 हजार कॉर्निया में से 1703 कॉर्निया प्रत्यारोपित किए गए जिससे नेत्रहीन मरीजों को रोशनी मिल सकी। यह 85% की उपयोग दर है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है

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