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Heart Health Awareness: किशोरावस्था में लिपिड स्क्रीनिंग से दिल की बीमारियों पर लगेगी लगाम

Heart Health Awareness: किशोरावस्था में लिपिड स्क्रीनिंग से दिल की बीमारियों पर लगेगी लगाम

नई दिल्ली में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दिल की बीमारियों की रोकथाम को लेकर एक अहम सुझाव दिया है। उनका मानना है कि किशोरावस्था से ही लिपिड प्रोफाइल स्क्रीनिंग शुरू करने से भविष्य में हृदय रोग के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने और स्कूल स्तर पर स्वास्थ्य जांच को शामिल करने की जरूरत बताई जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र में स्क्रीनिंग का उद्देश्य किसी बीमारी का पता लगाना नहीं, बल्कि संभावित जोखिम को समय रहते पहचानकर उसे नियंत्रित करना है। सही समय पर जांच, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से दिल की बीमारियों से बचाव संभव है।

नई गाइडलाइन, जैसे ACC/AHA Dyslipidemia Guidelines के अनुसार, 19 वर्ष की उम्र से नियमित लिपिड प्रोफाइल स्क्रीनिंग शुरू करने और हर पांच साल में जांच दोहराने की सिफारिश की गई है। वहीं बच्चों के लिए 9 से 11 वर्ष की उम्र के बीच यूनिवर्सल स्क्रीनिंग पर जोर दिया गया है, ताकि शुरुआती स्तर पर जोखिम कारकों की पहचान की जा सके।

अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि भारत और दक्षिण एशिया में लोगों में कम उम्र में ही दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसके पीछे हाई ट्राइग्लिसराइड्स, कम एचडीएल, इंसुलिन रेजिस्टेंस, पेट के आसपास चर्बी और अन्य मेटाबॉलिक कारणों को जिम्मेदार माना जाता है, जो धीरे-धीरे धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं।

Dr. Ram Manohar Lohia Hospital के कार्डियोलॉजिस्ट Dr. Puneet Aggarwal के अनुसार, हृदय रोग अचानक नहीं होता, बल्कि यह वर्षों में विकसित होने वाली प्रक्रिया है। इसलिए कम उम्र से ही जोखिम की पहचान कर समय पर हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि अब केवल एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को देखने के बजाय समग्र हृदय जोखिम का आकलन करना जरूरी है। इसमें हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, पारिवारिक इतिहास और अन्य जोखिम कारकों को भी शामिल किया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर एडवांस जांच जैसे लिपोप्रोटीन (ए) और कोरोनरी कैल्शियम स्कोर का भी सहारा लिया जा सकता है।

नई गाइडलाइन के अनुसार एलडीएल के लक्ष्य स्तर भी तय किए गए हैं, जिनमें सामान्य लोगों के लिए 100 mg/dL से कम, जोखिम वाले लोगों के लिए 70 mg/dL से कम और उच्च जोखिम या हृदय रोगियों के लिए 55 mg/dL से कम स्तर को सुरक्षित माना गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किशोरावस्था से ही जागरूकता और नियमित जांच को बढ़ावा दिया जाए, तो भविष्य में हृदय रोगों के बढ़ते खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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