Helderly loneliness India: बुजुर्गों का अकेलापन और बच्चों का तनाव: सामूहिक जिम्मेदारी से ही मिलेगा समाधान

Helderly loneliness India: बुजुर्गों का अकेलापन और बच्चों का तनाव: सामूहिक जिम्मेदारी से ही मिलेगा समाधान
नई दिल्ली। संयुक्त परिवारों के टूटने और बढ़ते शहरीकरण के कारण बुजुर्गों में अकेलापन, अवसाद और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है, वहीं स्कूली बच्चों में परीक्षा और डिजिटल जीवनशैली के कारण तनाव, एंजाइटी और डिप्रेशन की समस्या गंभीर हो रही है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते ठोस कदम न उठाए गए तो सामाजिक ताना-बाना कमजोर हो सकता है।
भारत में लगभग 15.6 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं, जिनकी संख्या 2050 तक 34.6 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं, 2024-25 के डेटा के अनुसार भारत में स्कूलों (कक्षा 1 से 12 तक) में लगभग 24.7 करोड़ छात्र पढ़ रहे हैं। राम मनोहर लोहिया अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक प्रोफेसर लोकेश सिंह शेखावत ने कहा कि बुजुर्गों का अकेलापन सामाजिक चिंता का विषय है। उन्हें परिवार से नियमित संवाद और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श की जरूरत है।
स्कूली बच्चों के तनाव के बारे में प्रो शेखावत ने कहा कि डिजिटल जीवनशैली और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने बच्चों में भावनात्मक समर्थन की कमी पैदा की है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है। लाइक्स-फॉलोअर्स की दौड़ और साइबर बुलिंग ने चिंता और अवसाद को और गंभीर बना दिया है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि बुजुर्गों के लिए पारिवारिक संवाद बढ़ाएं, रोजाना 15-20 मिनट समय दें, वीडियो कॉल और फैमिली डे जैसी गतिविधियां करें, घर के निर्णयों में उनकी राय लें और उन्हें मार्गदर्शक की भूमिका दें। बच्चों के लिए पारिवारिक संवाद समय तय करें, स्क्रीन टाइम नियंत्रित करें, खेलकूद और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें, स्कूलों में काउंसलिंग सुविधाएं मजबूत करें और उन्हें दादा-दादी जैसे वरिष्ठ सदस्यों से नियमित संपर्क कराएं।
प्रो शेखावत ने कहा कि चाहे बुजुर्गों का अकेलापन हो या बच्चों का तनाव, समाधान केवल सामूहिक जिम्मेदारी और परिवार की भागीदारी से ही संभव है। सामाजिक सहयोग और पारिवारिक जुड़ाव को बढ़ावा देने से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार और समाज में स्थिरता लाई जा सकती है।
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