Animal cruelty India: पशु क्रूरता के साथ एनिमल एक्टिविस्ट्स पर भी बढ़ रही हिंसा, संक्षय बब्बर का गंभीर आरोप

Animal cruelty India: पशु क्रूरता के साथ एनिमल एक्टिविस्ट्स पर भी बढ़ रही हिंसा, संक्षय बब्बर का गंभीर आरोप
रिपोर्ट नाम: अजीत कुमार
नोएडा में रविवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने देशभर में बढ़ती पशु क्रूरता और एनिमल एक्टिविस्ट्स के खिलाफ हिंसा को लेकर गंभीर चिंता जताई। नोएडा मीडिया क्लब में पशु अधिकार कार्यकर्ता और फिल्ममेकर संक्षय बब्बर तथा लोकप्रिय टीवी सेलेब्रिटी व पशु अधिकार कार्यकर्ता करुणा ने कहा कि आवारा जानवरों को हटाने के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों की गलत व्याख्या के बाद जमीनी स्तर पर हालात चिंताजनक हो गए हैं। उनका कहना है कि बीते कुछ समय में स्ट्रीट डॉग फीडर्स के खिलाफ धमकियों, झूठी शिकायतों, प्रशासनिक कार्रवाइयों और शारीरिक हिंसा के मामलों में तेजी आई है।
संक्षय बब्बर ने बताया कि पशुओं को खाना खिलाने और उनकी सुरक्षा करने वाली महिलाओं को खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो विवाद पहले कभी-कभार होते थे, वे अब भीड़ द्वारा हमलों, यौन हिंसा के प्रयासों और अमानवीय पशु क्रूरता में बदलते जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जानवरों के साथ-साथ उन नागरिकों का भी उत्पीड़न किया जा रहा है, जो बेज़ुबानों को भोजन देकर अपना मानवीय दायित्व निभा रहे हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन लोगों को भी बुलाया गया, जो पशुओं को खाना देने के कारण उत्पीड़न का शिकार हुए हैं। करुणा ने वर्चुअली जुड़कर अपने अनुभव साझा किए। इस दौरान वीडियो, ऑडियो रिकॉर्डिंग, शिकायत पत्र, नोटिस, एफआईआर और अन्य दस्तावेजी सबूत भी प्रस्तुत किए गए। बताया गया कि दिल्ली के हरिनगर में सामुदायिक कुत्ते की तलाश कर रही मां-बेटी को घेरकर पीटा गया, उन पर पानी डाला गया, वस्तुएं फेंकी गईं और यौन हमले का प्रयास हुआ। इसी तरह गीता कॉलोनी में एक महिला और उसकी 17 वर्षीय बेटी पर कुत्ते को खाना खिलाने के कारण लोहे की रॉड से हमला किया गया। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद और मध्य प्रदेश के ग्वालियर में भी महिला फीडर्स और उनके परिवारों पर सार्वजनिक रूप से हमले होने की घटनाएं सामने आई हैं।
संक्षय बब्बर ने कहा कि देश में पशु क्रूरता का एक भयावह पैटर्न उभर रहा है, जिसमें कुत्तों की पीट-पीटकर हत्या, एसिड अटैक, सामूहिक जहर देना, पिल्लों को घसीटना या कुचलना और नसबंदी किए गए कुत्तों को मरने के लिए छोड़ देने जैसी घटनाएं शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि महिला फीडर्स को निशाना बनाना, भीड़ की मानसिकता और कानूनी फैसलों की गलत व्याख्या इस हिंसा को और भड़का रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय न तो फीडिंग पर रोक लगाता है और न ही किसी भी प्रकार की हिंसा को वैध ठहराता है।
कार्यकर्ताओं ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और महिला फीडर्स को तत्काल सुरक्षा प्रदान करने की मांग की। बब्बर ने कहा कि इस मुद्दे से जुड़े संवैधानिक, कानूनी और मानवीय पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, ऐसे में जमीनी सच्चाई सामने लाना बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा के अधिकांश मामले कभी दर्ज ही नहीं हो पाते। उनके अनुसार, 7 नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की गलत व्याख्या के बाद यह संकट और गहरा गया है।





