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AIIMS Study Alert: बच्चों के लिए खामोश खतरा बना मोबाइल स्क्रीन टाइम, दिमागी विकास पर गंभीर असर

AIIMS Study Alert: बच्चों के लिए खामोश खतरा बना मोबाइल स्क्रीन टाइम, दिमागी विकास पर गंभीर असर

नई दिल्ली में AIIMS Delhi की ताजा रिसर्च ने बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। अध्ययन के मुताबिक, एक साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल स्क्रीन के संपर्क में लाना उनके मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकता है और आगे चलकर ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है।

आजकल घरों में बच्चों को शांत रखने के लिए मोबाइल फोन देना आम हो गया है, लेकिन विशेषज्ञ इसे “डिजिटल चुप्पी” का नाम दे रहे हैं। इसका मतलब है कि बच्चा बाहर से शांत दिखाई देता है, लेकिन उसका दिमाग सामाजिक और भावनात्मक संकेतों से दूर होता जाता है, जो उसके समग्र विकास के लिए बेहद जरूरी होते हैं।

एम्स दिल्ली के बाल न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख Dr Shefali Gulati के अनुसार, जीवन का पहला साल बच्चे के मस्तिष्क विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान आंखों का संपर्क, आवाज पहचानना, स्पर्श और बातचीत जैसे मानवीय अनुभव दिमाग को विकसित करते हैं, जिन्हें कोई भी स्क्रीन रिप्लेस नहीं कर सकती।

रिसर्च में सामने आया कि जिन बच्चों का स्क्रीन एक्सपोजर एक साल की उम्र में अधिक था, उनमें तीन साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते ऑटिज्म से जुड़े लक्षण ज्यादा देखे गए। खासतौर पर लड़कों में यह जोखिम अधिक पाया गया, हालांकि लड़कियां भी इससे पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

अध्ययन में 2000 से अधिक बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिसमें यह भी पाया गया कि करीब 80 प्रतिशत बच्चों में मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहारिक समस्याएं और नींद से जुड़ी परेशानियां देखने को मिलीं। इससे साफ है कि स्क्रीन टाइम केवल एक समस्या नहीं, बल्कि कई न्यूरो-डेवलपमेंटल चुनौतियों की वजह बन सकता है।

वैश्विक स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। Centers for Disease Control and Prevention के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, हर 31 में से एक बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित है। यह दर्शाता है कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में तेजी से उभरती स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।

विशेषज्ञों ने माता-पिता को सलाह दी है कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखें। बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताएं, उनसे बात करें, कहानियां सुनाएं, गाने सुनाएं और खिलौनों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें। सबसे जरूरी बात यह है कि मोबाइल स्क्रीन को बच्चों का “बेबीसिटर” न बनने दें।

एम्स दिल्ली की ओर से परिवारों की मदद के लिए 24×7 हेल्पलाइन, ईमेल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए परामर्श सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि समय रहते बच्चों में दिखने वाले संकेतों की पहचान कर उचित कदम उठाए जा सकें।

यह रिपोर्ट एक चेतावनी के रूप में सामने आई है कि सुविधा के लिए अपनाई जा रही डिजिटल आदतें कहीं बच्चों के भविष्य पर भारी न पड़ जाएं। यदि अभी सतर्कता नहीं बरती गई, तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।

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