Thalassemia Awareness: विवाह पूर्व एक जांच से थैलेसीमिया-मुक्त बन सकता है भविष्य

Thalassemia Awareness: विवाह पूर्व एक जांच से थैलेसीमिया-मुक्त बन सकता है भविष्य
नई दिल्ली। Thalassemia केवल खून की कमी की बीमारी नहीं बल्कि एक गंभीर आनुवंशिक रक्त विकार है, जो बच्चे के पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता, समय पर जांच और विवाह से पहले स्क्रीनिंग कराना है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि युवा शादी से पहले थैलेसीमिया की जांच करा लें, तो आने वाली पीढ़ियों को इस गंभीर बीमारी से बचाया जा सकता है।
World Thalassemia Day के अवसर पर Dr. Ram Manohar Lohia Hospital के बाल चिकित्सा विभाग के अध्यक्ष Dinesh Yadav ने बताया कि थैलेसीमिया एक वंशानुगत बीमारी है, जो माता-पिता से बच्चों में पहुंचती है। यदि माता और पिता दोनों इस बीमारी के कैरियर हों, तो उनके बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा लगभग 25 प्रतिशत तक हो सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों में जन्म के कुछ महीनों बाद ही गंभीर लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसे बच्चों को पांच से छह महीने की उम्र से ही बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। शरीर में हीमोग्लोबिन लगातार कम रहने के कारण बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। लंबे समय तक नियमित रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ने लगती है, जो हृदय, लिवर और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है।

डॉ. दिनेश यादव ने बताया कि थैलेसीमिया मरीजों को नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन के साथ आयरन कीलेशन थेरेपी की भी जरूरत होती है ताकि शरीर में जमा अतिरिक्त आयरन को नियंत्रित किया जा सके। उन्होंने कहा कि समय पर इलाज और नियमित देखभाल से मरीज बेहतर जीवन जी सकते हैं, लेकिन इस बीमारी की रोकथाम सबसे महत्वपूर्ण है।
बाल चिकित्सा विभाग में रक्त विज्ञान एवं कैंसर विज्ञान विशेषज्ञ Shilpa Khanna Arora ने बताया कि थैलेसीमिया का एकमात्र स्थायी इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। इसमें परिवार के ऐसे सदस्य से बोन मैरो लिया जाता है जिसका मैच पूरी तरह उपयुक्त हो। अब हाप्लो बीएमटी जैसी नई तकनीकों की मदद से आंशिक रूप से मेल खाने वाले पारिवारिक दाताओं से भी प्रत्यारोपण संभव हो रहा है। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट का निर्णय विशेषज्ञ सलाह और पूरी चिकित्सीय जांच के बाद ही लिया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों ने कहा कि गर्भावस्था के शुरुआती 8 से 12 सप्ताह के भीतर भ्रूण की जांच कर यह पता लगाया जा सकता है कि बच्चा थैलेसीमिया से प्रभावित है या नहीं। इससे गंभीर मामलों में समय रहते चिकित्सीय निर्णय लेने में मदद मिलती है। इसी कारण शादी करने या गर्भधारण की योजना बना रहे युवाओं को थैलेसीमिया की जांच कराने की सलाह दी जाती है।
डॉक्टरों के अनुसार, साधारण रक्त जांच के जरिए आसानी से यह पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति थैलेसीमिया का वाहक है या नहीं। यह जांच सरकारी अस्पतालों में मुफ्त उपलब्ध है, जबकि निजी लैब में इसकी लागत करीब 500 रुपये तक आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समाज में जागरूकता बढ़े और लोग विवाह पूर्व स्क्रीनिंग को अपनाएं, तो आने वाले वर्षों में थैलेसीमिया के मामलों में बड़ी कमी लाई जा सकती है।





