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New Delhi : टेक्निकल टेक्सटाइल से फुटवियर उद्योग में बदलाव, वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ता भारत- गिरिराज सिंह

New Delhi : आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य अब केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में मजबूत भागीदारी और नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस बदलाव में फुटवियर उद्योग एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरा है। रोजमर्रा की जरूरत से जुड़ा यह क्षेत्र बच्चों से लेकर कामगारों और एथलीट्स तक हर वर्ग के जीवन का हिस्सा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फुटवियर उत्पादक है, लेकिन इसके बावजूद वैश्विक निर्यात में हिस्सेदारी अभी भी सीमित है।

यह अंतर उत्पादन क्षमता की कमी के कारण नहीं, बल्कि सामग्री, डिजाइन और प्रदर्शन को लेकर सोच में बदलाव की जरूरत को दर्शाता है। इस परिवर्तन के केंद्र में तकनीकी वस्त्र यानी टेक्निकल टेक्सटाइल तेजी से उभर रहे हैं। आगरा जैसे प्रमुख उत्पादन केंद्रों में यह बदलाव साफ दिखाई देता है, जहां निर्माता पहले से ही अधिक आरामदायक, टिकाऊ और उन्नत सामग्री का उपयोग कर रहे हैं, भले ही वे इसे औपचारिक रूप से टेक्निकल टेक्सटाइल न कहें।

उद्योग से जुड़े हितधारकों के अनुसार उपभोक्ताओं की अपेक्षाएं तेजी से बदल रही हैं। अब हल्के, बेहतर कुशनिंग वाले, हवादार और टिकाऊ जूतों की मांग बढ़ रही है। जो विशेषताएं पहले प्रीमियम उत्पादों तक सीमित थीं, वे अब सामान्य मानक बन चुकी हैं। इसी के साथ यह भी स्पष्ट हुआ है कि फुटवियर उद्योग पहले से ही बड़े पैमाने पर टेक्निकल टेक्सटाइल का उपयोग कर रहा है।

वैश्विक स्तर पर फुटवियर उद्योग हर साल लगभग 23.9 बिलियन जोड़ी जूते बनाता है और इसका बाजार करीब 500 बिलियन डॉलर का है। भारत इस उत्पादन में लगभग 12.5 प्रतिशत योगदान देता है, लेकिन निर्यात में हिस्सेदारी केवल 2 प्रतिशत है। वहीं, दुनिया के 86 प्रतिशत फुटवियर नॉन-लेदर श्रेणी के हैं, जबकि भारत का उद्योग लंबे समय तक चमड़े पर केंद्रित रहा है।

घरेलू बाजार भी तेजी से विस्तार कर रहा है। वर्ष 2025 तक भारत का फुटवियर बाजार 20.67 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। हालांकि, एक औसत भारतीय साल में केवल 2 जोड़ी जूते खरीदता है, जबकि वैश्विक औसत 7 से 8 जोड़ी का है। बढ़ती आय और बदलती पसंद के साथ यह संख्या बढ़ने की संभावना है, जिसमें आराम और प्रदर्शन प्रमुख भूमिका निभाएंगे।

तकनीकी वस्त्र इस विकास के अगले चरण में अहम भूमिका निभा रहे हैं। स्मार्ट फुटवियर, डिजिटल डिजाइन, एआई आधारित मॉडलिंग और फुट स्कैनिंग जैसी तकनीकों के जरिए अब व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार जूते बनाए जा रहे हैं। स्नीकर श्रेणी में तेजी से वृद्धि इसका उदाहरण है, जो आने वाले वर्षों में दोगुनी होने की ओर अग्रसर है।

संवहनीयता भी उद्योग का एक महत्वपूर्ण पहलू बनती जा रही है। पुनर्चक्रित प्लास्टिक और बायोडिग्रेडेबल फाइबर जैसे विकल्प उत्पादन में शामिल हो रहे हैं। यह न केवल पर्यावरण के लिए जरूरी है, बल्कि भारत को वैश्विक स्तर पर टिकाऊ सामग्री के आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करने का अवसर भी देता है। इसके साथ ही 3डी बुनाई और उन्नत विनिर्माण तकनीकों से उत्पादन अधिक कुशल और कम अपशिष्ट वाला बन रहा है।

भारत का फुटवियर इकोसिस्टम पहले से ही मजबूत है। इस उद्योग में 20 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। देश के प्रमुख क्लस्टर जैसे आगरा, कानपुर, चेन्नई, रानीपेट, अंबूर और कोलकाता उत्पादन और नवाचार के केंद्र बन चुके हैं। हालांकि, श्रमिक उत्पादकता के मामले में अभी सुधार की गुंजाइश बनी हुई है।

टेक्निकल टेक्सटाइल की ओर बढ़ता यह कदम किसी नए उद्योग की शुरुआत नहीं, बल्कि मौजूदा क्षमता को पहचानने और उसे व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने का प्रयास है। यदि इस एकीकरण को सही दिशा में विकसित किया जाए, तो इससे नवाचार को बढ़ावा मिलेगा, निर्यात बढ़ेगा और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

भारत की वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व की दिशा में यात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह पारंपरिक उद्योगों और आधुनिक तकनीकों के मेल का कितना प्रभावी उपयोग करता है। फुटवियर क्षेत्र में टेक्निकल टेक्सटाइल इस परिवर्तन का आधार बन सकते हैं और भारत को एक नई वैश्विक सफलता की कहानी की ओर ले जा सकते हैं।

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